जब गाँव तक सड़क पहुँचना सपना हुआ करता था
आज़ादी के बाद ग्रामीण इलाकों की सच्चाई
एक समय था जब पक्की सड़क देखना एक त्योहार जैसा होता था। देश आज़ाद हो गया था, लेकिन गाँव के लोग सिर्फ पगडंडियों के सहारे जीते थे। बैलगाड़ी ही सबसे बड़ा वाहन थी। शहरों में विकास हो रहा था, लेकिन भारत की आत्मा, यानी हमारे गाँव, धूल और मिट्टी में अटे पड़े थे। सच्चाई यह थी कि ग्रामीण इलाकों का मतलब ही था—कच्चे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते। अगर किसी के घर मोटर-गाड़ी आ जाती, तो पूरा गाँव देखने उमड़ पड़ता था। सड़क सिर्फ एक रास्ता नहीं थी, वह विकास का एक सपना थी जो बहुत दूर लगता था।
बारिश में कट जाते गाँव, ठप पड़ जाता जीवन
चौमासा (बरसात का मौसम) हमारे लिए किसी सजा से कम नहीं था। आसमान से पानी बरसता, और जमीन पर हमारा संपर्क दुनिया से टूट जाता। कच्चे रास्ते दलदल बन जाते थे। गाँव एक टापू में बदल जाता था जहाँ से बाहर निकलना असंभव था। सोचिए, अगर ऐसे समय में कोई गंभीर बीमार पड़ जाए, तो उसे अस्पताल कैसे ले जाएं? कई बार इलाज न मिलने से रास्ते में ही अनहोनी हो जाती थी। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे। किसान की दूध-सब्जी बाजार तक नहीं पहुँचती थी और खेत में ही सड़ जाती थी। जिंदगी पूरी तरह थम जाती थी।
शहर और गाँव के बीच बढ़ती दूरी
सड़क न होने से सिर्फ आने-जाने में दिक्कत नहीं थी। इसने शहर और गाँव के बीच एक बहुत बड़ी खाई खोद दी थी। शहर वाले तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहे थे, और गाँव वाले कीचड़ में फंसे थे। शहर में अस्पताल, स्कूल और बाजार थे; गाँव में सिर्फ संघर्ष था। हमारा नौजवान गाँव छोड़कर शहर भागता था क्योंकि यहाँ उसे कोई भविष्य नहीं दिखता था। यह दूरी सिर्फ किलोमीटर की नहीं थी, यह विकास और अवसरों की दूरी थी। हमें लगता था कि हम एक ही देश में रहकर भी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं क्योंकि हमारे पैरों के नीचे पक्की जमीन नहीं थी।
सड़क क्यों बन गई ग्रामीण विकास की पहली ज़रूरत
स्कूल, अस्पताल और बाज़ार तक पहुँच का सवाल
विकास का मतलब बड़ी इमारतें नहीं हैं। विकास का मतलब है कि जब आपका बच्चा बीमार हो, तो उसे तुरंत डॉक्टर मिले। जब उसे पढ़ना हो, तो स्कूल पास हो। जब आपको कुछ खरीदना या बेचना हो, तो बाजार आपकी पहुँच में हो। कच्ची पगडंडी पर ये सब मुमकिन नहीं था। सड़क इन तीनों जरूरतों को पूरा करने वाली पहली सीढ़ी है। सड़क बनी, तो एम्बुलेंस गाँव तक आई। बसें चलने लगीं तो बच्चे शहर के कॉलेज तक पहुँच गए। यह सिर्फ डामर की परत नहीं थी, बल्कि बेहतर जिंदगी तक पहुँचने का रास्ता था।
किसान की फसल और सड़क का रिश्ता
आप खून-पसीना एक करके फसल उगाते हैं। लेकिन अगर वह मंडी तक न पहुँचे, तो सब बेकार है। पहले, टमाटर, सब्जियां और दूध जैसी जल्दी खराब होने वाली चीजें रास्ते में ही सड़ जाती थीं। बैलगाड़ी से जाने में दिन भर लगता था। मजबूरी में गाँव के बिचौलिये को औने-पौने दाम पर बेचना पड़ता था। पक्की सड़क किसान की सबसे बड़ी मददगार है। अब आप सुबह फसल तोड़ते हैं और दोपहर तक शहर की मंडी में अच्छे दाम पर बेच आते हैं। आपकी मेहनत का सही मोल आपको मिलने लगा है। सड़क ने खेत को सीधे बाजार से जोड़ दिया है।
रोज़गार और आवागमन का सीधा संबंध
पहले गाँव में काम नहीं था, तो लोग हमेशा के लिए शहर जाकर बस जाते थे। घर-बार छूट जाता था। सड़क ने इस मजबूरी को कम किया। अब गाँव का नौजवान सुबह पास के कस्बे या शहर जाकर नौकरी कर सकता है और शाम को अपने घर लौट सकता है। आना-जाना आसान हुआ, तो गाँव में भी नए काम-धंधे खुले। कोई टेम्पो चलाने लगा, किसी ने दुकान खोल ली। सड़क से आवागमन बढ़ा, और आवागमन से कमाई के नए रास्ते खुले। इसने गाँव के हुनर को शहर के अवसरों से मिला दिया।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत कैसे हुई
साल 2000 का भारत और ग्रामीण हालात
याद कीजिए साल 2000 का समय। दुनिया 21वीं सदी में कदम रख चुकी थी। शहरों में कंप्यूटर आ रहे थे, मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी थी। भारत ‘शाइनिंग इंडिया’ बनने की राह पर था। लेकिन, भारत का एक बड़ा हिस्सा—हमारे गाँव—अभी भी अंधेरे में था। उस समय देश के लगभग 40 प्रतिशत गाँवों तक जाने के लिए पक्की सड़क नहीं थी। हालात ये थे कि एक ही देश में दो दुनिया बसती थी। एक तरफ तेज रफ्तार शहर, और दूसरी तरफ कीचड़ और धूल में सने गाँव। यह महसूस किया गया कि अगर गाँव पीछे रह गए, तो देश कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा। यह वह समय था जब बदलाव की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी।
एक राष्ट्रीय सोच के रूप में PMGSY
तब केंद्र सरकार ने माना कि गाँवों को सड़क से जोड़ना किसी एक राज्य या जिले का काम नहीं है। यह पूरे देश की जिम्मेदारी है। यह एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय सोच थी। पहली बार, इतनी बड़े पैमाने पर योजना बनी कि हर उस गाँव को पक्की सड़क से जोड़ा जाएगा, जिसकी आबादी मैदानी इलाकों में 500 और पहाड़ी इलाकों में 250 से ज्यादा है। इसे ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ (PMGSY) नाम दिया गया। इसका मकसद सिर्फ डामर बिछाना नहीं था, बल्कि इसका मकसद था कि गाँव का आदमी साल के 365 दिन, हर मौसम में शहर से जुड़ा रहे। यह ‘बारहमासी’ (All-weather) सड़कों का वादा था।
25 दिसंबर और ग्रामीण भारत के लिए इसका अर्थ
यह तारीख ग्रामीण भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखी गई है। 25 दिसंबर 2000 को इस योजना की शुरुआत हुई। यह दिन इसलिए भी खास है क्योंकि यह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन है, जिन्होंने यह सपना देखा था कि हर गाँव सड़क से जुड़े। ग्रामीण भारत के लिए यह दिन एक नए युग की शुरुआत जैसा था। यह गाँवों को मिला अब तक का सबसे बड़ा तोहफा था। 25 दिसंबर का मतलब था—अलगाव का अंत और मुख्यधारा से जुड़ाव की शुरुआत। उस दिन गाँव के लोगों की आंखों में एक नई उम्मीद जागी थी।
योजना का मूल उद्देश्य क्या था
हर मौसम में चलने वाली सड़कों की ज़रूरत
सिर्फ नाम के लिए सड़क बना देना काफी नहीं था। कच्ची पगडंडियां तो पहले भी थीं, लेकिन वे गर्मियों में धूल का गुबार और बारिश में दलदल बन जाती थीं। PMGSY का सबसे बड़ा और साफ मकसद था—’बारहमासी’ सड़क देना। इसका मतलब ऐसी पक्की और मजबूत सड़क, जिस पर साल के 365 दिन, चाहे मूसलाधार बारिश हो या कड़ाके की ठंड, गाड़ी आराम से आ-जा सके। यह तय करना था कि अब मौसम बदलने पर गाँव वालों का रास्ता बंद नहीं होगा। बारिश अब किसी के लिए कैद का कारण नहीं बननी चाहिए थी।
असंबद्ध बसाहटों को जोड़ने का लक्ष्य
हमारे देश में हजारों ऐसे गाँव, टोले और मज़रें थीं, जिनका नाम सरकारी कागजों में तो था, लेकिन वहां तक पहुंचने का कोई पक्का रास्ता नहीं था। इन्हें ही ‘असंबद्ध बसाहटें’ कहा गया। योजना ने एक सीधा और साफ लक्ष्य रखा: मैदानी इलाकों में जिन बस्तियों की आबादी 500 है, और पहाड़ी या आदिवासी इलाकों में जहाँ 250 लोग भी रहते हैं, उन सबको पक्की सड़क से जोड़ना है। यह उन लोगों तक पहुँचने की एक बड़ी कोशिश थी जो अब तक विकास का इंतजार कर रहे थे और दुनिया से कटे हुए थे।
गाँव को मुख्यधारा से जोड़ने की सोच
यह योजना सिर्फ गिट्टी, सीमेंट और तारकोल बिछाने का ठेका नहीं थी। इसके पीछे एक बहुत बड़ी और गहरी सोच थी—गाँव के आदमी को देश की तरक्की में बराबर का हिस्सेदार बनाना। जब तक गाँव देश की ‘मुख्यधारा’ (mainstream) से कटा रहेगा, तब तक भारत मजबूत नहीं हो सकता। सड़क ही वह जरिया बनी जिससे गाँव की उपज शहर के बाजार तक पहुंची और शहर की सुविधाएं—जैसे अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य—गाँव के दरवाजे तक आईं। यह सोच थी कि गाँव में रहने वाला बच्चा भी वही मौके पाए जो शहर में रहने वाले को मिलते हैं। यह गरीबी और पिछड़ेपन के अंधेरे से गाँव को बाहर निकालने का एक पक्का इरादा था।
किन गाँवों को पहले जोड़ा गया
मैदानी इलाकों के लिए तय मानक
सरकार के सामने चुनौती बड़ी थी। हर गाँव को एक साथ सड़क देना मुमकिन नहीं था। इसलिए, एक तरकीब निकाली गई—जिन गाँवों में ज़्यादा लोग रहते हैं, उन्हें पहले जोड़ा जाए ताकि एक सड़क से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का भला हो। मैदानी इलाकों (समतल ज़मीन वाले राज्यों) के लिए एक साफ नियम बनाया गया: जिस गाँव की आबादी साल 2001 की जनगणना के मुताबिक 500 या उससे ज़्यादा है, वहाँ सबसे पहले सड़क बनेगी। यह एक व्यावहारिक फैसला था। इसने तय किया कि बड़ी बसाहटों को प्राथमिकता मिले और विकास का पहिया तेजी से घूमे।
पहाड़ी और दूरदराज़ क्षेत्रों की अलग ज़रूरतें
हमारा देश बहुत बड़ा और विविध है। जो नियम मैदानों में चलता है, वह पहाड़ों या रेगिस्तान में नहीं चल सकता। पहाड़ी राज्यों, पूर्वोत्तर भारत और रेगिस्तानी इलाकों में लोग दूर-दूर बसे होते हैं। वहाँ 500 की आबादी वाला गाँव मिलना मुश्किल होता है। अगर वहाँ भी 500 का नियम लगाया जाता, तो शायद उन दुर्गम इलाकों तक सड़क कभी पहुँचती ही नहीं। उनकी मुश्किलों को समझते हुए, सरकार ने इन क्षेत्रों के लिए मानक घटा दिया। यहाँ 250 या उससे ज़्यादा आबादी वाली बसाहटों को सड़क से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया। यह दिखाता है कि योजना में हर तरह के भूगोल का खयाल रखा गया।
जनजातीय और संवेदनशील इलाकों पर विशेष ध्यान
देश के कुछ हिस्से ऐसे थे जो विकास की दौड़ में सबसे पीछे रह गए थे। ये मुख्य रूप से हमारे आदिवासी बहुल क्षेत्र थे। इसके अलावा, कुछ ऐसे इलाके भी थे जो नक्सलवाद या अन्य कारणों से ‘संवेदनशील’ माने जाते थे। इन जगहों पर सड़क का न होना ही गरीबी और पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण था। PMGSY में इन इलाकों को ‘विशेष श्रेणी’ में रखा गया। यहाँ भी 250 की आबादी का मानक लागू किया गया, और कई बार तो इससे भी छोटी बसाहटों को जोड़ने के लिए नियमों में ढील दी गई। मकसद साफ था—जो समाज के हाशिये पर हैं, उन तक विकास की किरण सबसे पहले पहुँचे।
पैसा कहाँ से आया और कैसे खर्च हुआ
शुरुआत में पूरी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की
जब साल 2000 में यह महायज्ञ शुरू हुआ, तो यह एक बहुत बड़ा सपना था। उस समय कई राज्यों की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वे हर गाँव तक पक्की सड़क बनाने का भारी खर्च उठा सकें। अगर यह काम राज्यों पर छोड़ दिया जाता, तो शायद यह कभी पूरा नहीं होता। इसलिए, केंद्र सरकार ने बड़ा दिल दिखाते हुए तय किया कि इस योजना का पूरा का पूरा खर्च दिल्ली (केंद्र) उठाएगा। यह एक ‘सौ प्रतिशत केंद्रीय योजना’ के रूप में शुरू हुई थी। इसका मतलब था कि सड़क बनाने के लिए ईंट-गिट्टी से लेकर तारकोल तक का एक-एक पैसा केंद्र सरकार ने भेजा। यह इसलिए किया गया ताकि पैसे की कमी के कारण देश के किसी भी कोने में काम न रुके।
बाद में राज्यों की भागीदारी क्यों बढ़ी
समय के साथ देश बदला और व्यवस्थाएं भी बदलीं। यह महसूस किया गया कि सड़क राज्य की संपत्ति है, इसलिए उसे बनाने और संभालने में राज्य सरकार की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए। जब राज्य अपनी जेब से पैसा लगाता है, तो वह काम की क्वालिटी पर ज्यादा ध्यान देता है और सड़क बनने के बाद उसकी देखरेख भी बेहतर तरीके से करता है। यह जिम्मेदारी का बंटवारा था। इसलिए, बाद के वर्षों में (खासकर 2015 के बाद) नियमों में बदलाव किया गया। अब आम राज्यों के लिए यह तय हुआ कि सड़क बनाने में जो 100 रुपये खर्च होंगे, उसमें से 60 रुपये केंद्र सरकार देगी और बाकी 40 रुपये राज्य सरकार को मिलाने होंगे। इसे 60:40 का फार्मूला कहते हैं।
पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष राहत
हमारा देश विविधताओं से भरा है। जो नियम मैदानों में लागू होता है, वह पहाड़ों पर नहीं चल सकता। हमारे पूर्वोत्तर के आठ राज्य (North-East states) और हिमालयी राज्य (जैसे हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर) बहुत दुर्गम हैं। वहाँ पहाड़ काटकर सड़क बनाना मैदानी इलाकों से कई गुना महंगा और मुश्किल काम है। इन राज्यों की अपनी कमाई भी सीमित होती है। उनकी इन मुश्किलों को समझते हुए, केंद्र सरकार ने उन्हें विशेष राहत जारी रखी। इन राज्यों पर 60:40 का नियम लागू नहीं होता। इनके लिए आज भी केंद्र सरकार 90 प्रतिशत पैसा देती है, और राज्य को सिर्फ 10 प्रतिशत मिलाना पड़ता है। यह 90:10 का फार्मूला इस बात का सबूत है कि मुश्किल इलाकों का खास खयाल रखा गया है।
योजना को ज़मीन पर उतारने की व्यवस्था
ग्रामीण विकास मंत्रालय की भूमिका
इतनी बड़ी योजना को देशभर में लागू करना कोई बच्चों का खेल नहीं था। इसके लिए एक मजबूत ‘कमांड सेंटर’ की जरूरत थी। यह जिम्मेदारी दिल्ली स्थित ‘ग्रामीण विकास मंत्रालय’ (Ministry of Rural Development) को सौंपी गई। मंत्रालय ही इस योजना का ‘बॉस’ है। वह तय करता है कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा और कौन सी सड़क पहले बनेगी। मंत्रालय के तहत एक खास संस्था बनाई गई—राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना विकास एजेंसी (NRIDA)। यह एजेंसी योजना का दिमाग है। यह राज्यों को तकनीकी मदद देती है, नियम-कायदे बनाती है और यह पक्का करती है कि दिल्ली में बैठकर जो सपना देखा गया है, वह दूरदराज़ के गाँव में ज़मीन पर हकीकत बने।
सड़कों की गुणवत्ता पर नज़र रखने की प्रक्रिया
सड़कें तो बहुत बनती हैं, लेकिन वे पहली ही बारिश में बह जाती हैं। PMGSY को इस बदनामी से बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसलिए, एक बहुत सख्त ‘त्रि-स्तरीय’ (Three-Tier) जांच व्यवस्था बनाई गई। यह किसी परीक्षा की तरह है।
- पहला स्तर (खुद की जाँच): जिस एजेंसी (ठेकेदार) ने सड़क बनाई है, उसे खुद अपनी लैब में सड़क की मजबूती की जांच करनी होती है और रिपोर्ट देनी होती है।
- दूसरा स्तर (राज्य की जाँच): राज्य सरकार अपने अधिकारियों (State Quality Monitors) को भेजती है। वे बिना बताए मौके पर जाकर सैंपल लेते हैं और देखते हैं कि सड़क मानकों के मुताबिक बनी है या नहीं।
- तीसरा स्तर (केंद्र की जाँच): यह सबसे कड़ा इम्तिहान है। केंद्र सरकार दिल्ली से अपने ‘स्वतंत्र निरीक्षकों’ (National Quality Monitors) को अचानक किसी भी गाँव में भेजती है। उनकी रिपोर्ट आखिरी मानी जाती है।
इस सख्त निगरानी का ही नतीजा है कि PMGSY की सड़कें दूसरी सरकारी सड़कों के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ और बेहतर मानी जाती हैं।
केंद्र और राज्य के बीच तालमेल
यह योजना केंद्र की थी, लेकिन सड़कें तो राज्यों की जमीन पर बननी थीं। इसलिए दोनों के बीच बेहतरीन तालमेल (coordination) जरूरी था। इसके लिए हर राज्य में एक ‘स्टेट नोडल एजेंसी’ बनाई गई। यह एजेंसी पुल का काम करती है। यह दिल्ली से पैसा और निर्देश लेती है और अपने राज्य के इंजीनियरों और ठेकेदारों से काम करवाती है। राज्य सरकारें ज़मीन उपलब्ध कराती हैं, जंगल विभाग से मंजूरी लेती हैं और स्थानीय विवादों को सुलझाती हैं। वहीं, केंद्र तकनीकी मदद और फंड देता है। यह सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ दिल्ली और राज्य की राजधानियाँ मिलकर गाँव के विकास के लिए एक टीम की तरह काम करती हैं।
पहला चरण: जब पहली बार गाँव सड़क से जुड़े
साल 2000 में शुरू हुआ बड़ा अभियान
साल 2000 का वो दौर याद करें। यह सिर्फ फाइलों में दबी एक और सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि यह आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा ‘संपर्क महाअभियान’ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने एक सपना देखा था कि भारत का कोई भी गाँव अंधेरे में न रहे। यह एक राष्ट्रव्यापी मिशन था, एक संकल्प था कि अब दिल्ली और गाँव के बीच की दूरी को पाटना ही होगा। इस साल ने तय किया कि अब विकास सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहेगा, उसका रास्ता खेत-खलिहानों से होकर गुजरेगा। यह एक नए भारत की नींव रखने जैसा था।
लाखों बसाहटों तक पहुँची सड़क
पहले चरण का लक्ष्य बहुत स्पष्ट था—उन बसाहटों को जोड़ना जो सदियों से अलग-थलग पड़ी थीं। यह काम आसान नहीं था। पहाड़ काटे गए, जंगलों से रास्ते निकाले गए, और नदियों पर पुल बांधे गए। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही सालों में देश के नक्शे पर लाखों नई लकीरें खींच दी गईं। यह सिर्फ सड़कें नहीं थीं, बल्कि उम्मीद की नई रेखाएं थीं जो उन टोलों, मजरों और ढाणियों तक पहुँचीं जहाँ पहले कभी साइकिल चलाना भी मुश्किल था। एक-एक करके लाखों बस्तियाँ, जिनका नाम शायद जिले के अधिकारी भी नहीं जानते थे, मुख्यधारा से जुड़ती चली गईं।
गाँवों में बदलता रोज़मर्रा का जीवन
सड़क आते ही गाँव की आबोहवा बदल गई। सबसे पहला बदलाव तो यह आया कि ‘कीचड़ और धूल’ का दौर खत्म हुआ। पहले शहर जाने में जहाँ पूरा दिन खप जाता था, अब वही काम कुछ घंटों में होने लगा। शहर जाना अब साल-छह महीने का ‘इवेंट’ नहीं रहा, बल्कि रोज़ का आसान काम बन गया। किसी के बीमार पड़ने पर अब खटिया या डोली का सहारा नहीं लेना पड़ता था; एम्बुलेंस, जीप या ऑटो दरवाजे तक आने लगे। बरसात का डर खत्म हो गया कि अब हम कैद हो जाएंगे। सड़क ने गाँव वालों को एक नया आत्मविश्वास दिया कि वे भी दुनिया के साथ कदम मिलाकर चल सकते हैं।
दूसरा चरण: पुरानी सड़कों को मजबूत करने की कोशिश
केवल नई सड़क नहीं, बेहतर सड़क पर ज़ोर
जब पहला चरण चल रहा था और नए गाँव जुड़ रहे थे, तब एक और बड़ी समस्या सामने आई। देश में बहुत सी ऐसी ग्रामीण सड़कें थीं जो पहले से बनी हुई थीं, लेकिन उनकी हालत बहुत खस्ता थी। वे टूटी-फूटी थीं, पतली थीं, और उन पर चलना किसी सजा से कम नहीं था। सरकार को समझ आया कि सिर्फ नई सड़कें बनाना ही काफी नहीं है, जो सड़कें मौजूद हैं उन्हें बचाना भी जरूरी है। इसलिए, PMGSY के दूसरे चरण (Phase-II) में फोकस बदला। अब नारा था—सिर्फ जुड़ाव नहीं, बल्कि ‘गुणवत्तापूर्ण’ (Quality) जुड़ाव। तय किया गया कि पुरानी और जर्जर सड़कों को चौड़ा किया जाएगा, उनके गड्ढे भरे जाएंगे और उन्हें नया जैसा मजबूत बनाया जाएगा। इसे ‘अपग्रेडेशन’ (Upgradation) कहा गया।
बाज़ार और सेवा केंद्रों से जुड़ाव
दूसरे चरण की सोच बहुत व्यावहारिक थी। यह देखा गया कि गाँव का आदमी सबसे ज्यादा सड़क का इस्तेमाल किसलिए करता है? जवाब था—अपनी फसल बेचने के लिए मंडी (बाज़ार) जाने के लिए, या फिर बड़े अस्पताल, कॉलेज और बैंक जैसी सुविधाओं के लिए। इन जगहों को ‘ग्रामीण विकास के केंद्र’ (Rural Growth Centers) माना गया। दूसरे चरण में, खास तौर पर उन सड़कों को चुना गया जो गाँवों को सीधे इन मंडियों और सेवा केंद्रों से जोड़ती थीं। इन्हें ‘थ्रू रूट्स’ (Through Routes) कहा गया। मकसद साफ था—किसान के खेत और बाजार के बीच की दूरी को सबसे अच्छी सड़क से पाट देना, ताकि उसकी तरक्की का रास्ता आसान हो।
सफ़र का समय और लागत कैसे घटी
खराब सड़क पर चलने का मतलब है—ज़्यादा समय और ज़्यादा पैसा। टूटी सड़क पर गाड़ी धीरे चलती है, पेट्रोल-डीजल ज़्यादा पीती है, और गाड़ी के पुर्जे जल्दी टूटते हैं। इसका सीधा बोझ गाँव वाले की जेब पर पड़ता था। जब दूसरे चरण में सड़कें चौड़ी और सपाट बनीं, तो यह गणित बदल गया। जो सफर पहले दो घंटे में होता था, वह अब 45 मिनट में होने लगा। समय बचना मतलब पैसा बचना। गाड़ी का किराया कम हुआ, माल ढुलाई सस्ती हो गई। किसान अपनी सब्जी अब ताज़ा रहते हुए मंडी पहुँचाने लगा, जिससे उसे दाम अच्छे मिले। अच्छी सड़क ने गाँव वालों की जेब से फालतू खर्च का बोझ कम कर दिया।
संवेदनशील इलाकों में सड़क का अलग महत्व
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की सच्चाई
देश के कुछ हिस्से ऐसे थे जहाँ विकास की किरण नहीं, बल्कि डर का साया था। घने जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम रास्तों के बीच बसे ये ‘नक्सल प्रभावित’ इलाके बाकी देश से पूरी तरह कटे हुए थे। यहाँ की सच्चाई यह थी कि सूरज ढलते ही लोग घरों में दुबक जाते थे। सड़क न होने का मतलब था कि यहाँ प्रशासन की पहुँच लगभग शून्य थी। न पुलिस समय पर पहुँच सकती थी, न डॉक्टर और न ही शिक्षक। इन इलाकों में रहने वाले आदिवासी और गरीब लोग दोहरी मार झेल रहे थे—एक तरफ घोर गरीबी और दूसरी तरफ हिंसा का डर। इन क्षेत्रों में सड़क का न होना ही उनकी सबसे बड़ी मुसीबत और नक्सलियों की सबसे बड़ी ताकत थी।
सड़क, सुरक्षा और भरोसे का रिश्ता
इन इलाकों में सड़क बनाना किसी जंग से कम नहीं था। कई बार सड़क बनाने वाले मजदूरों और इंजीनियरों को धमकियां मिलीं, उनकी मशीनें जलाई गईं। ऐसा इसलिए, क्योंकि सड़क सिर्फ डामर की परत नहीं थी; वह ‘सुरक्षा’ का रास्ता थी। जब पक्की सड़क बनी, तो सुरक्षा बलों (जैसे CRPF) की गाड़ियां आसानी से अंदर तक पहुँचने लगीं। गश्त बढ़ी, तो नक्सलियों का दबदबा कम हुआ और लोगों में सुरक्षा का भाव जागा। लेकिन, यह रिश्ता सिर्फ बंदूक और वर्दी का नहीं था। सड़क का मतलब था कि अब सरकारी अधिकारी, बीडीओ (BDO) और कलेक्टर भी गाँव तक आ सकते थे। जब गाँव वाले ने अपने दरवाजे पर प्रशासन को खड़ा देखा, तो सरकार पर उसका टूटा हुआ भरोसा फिर से जुड़ने लगा। सड़क ने यह अहसास दिलाया कि वे अकेले नहीं हैं।
विकास के ज़रिए हालात बदलने की कोशिश
यह बात साफ हो चुकी थी कि इन इलाकों में हिंसा को सिर्फ हथियार के दम पर नहीं हराया जा सकता। अंधेरे को मिटाने के लिए विकास का उजाला जरूरी था। सड़क इस बदलाव की सबसे बड़ी वाहक बनी। इसे ‘विकास के जरिए विश्वास जीतने’ की रणनीति कहा गया। जब सड़क पहुँची, तो उसके साथ-साथ स्कूल, आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र भी सक्रिय हुए। गाँव का नौजवान, जिसके हाथ में पहले कोई काम नहीं था, अब सड़क के रास्ते शहर जाकर रोजगार तलाशने लगा। जब पेट में रोटी और हाथ में काम आया, तो बहकावे में आने की गुंजाइश कम हो गई। सड़क ने इन संवेदनशील इलाकों में लोगों को मुख्यधारा से जुड़ने का एक ठोस कारण और हिंसा छोड़ने का एक बेहतर विकल्प दिया।
तीसरा चरण: ज़रूरी रास्तों पर ध्यान
स्कूल, अस्पताल और मंडी तक पहुँच
पहले और दूसरे चरण में गाँव मुख्य सड़कों से जुड़ गए थे। लेकिन एक कमी अब भी महसूस हो रही थी। गाँव से बाहर निकलने का रास्ता तो मिल गया था, लेकिन वह रास्ता जरूरी जगहों तक सीधे नहीं पहुँचता था। PMGSY के तीसरे चरण (Phase-III) की सोच एकदम अलग और खास है। इसमें यह तय किया गया कि अब सड़कें ‘मंजिल’ को ध्यान में रखकर बनाई जाएंगी। गाँव के लोगों को सबसे ज्यादा कहाँ जाना पड़ता है? जवाब था—बच्चों को हाई स्कूल या कॉलेज, बीमार को बड़े अस्पताल, और किसान को अपनी उपज बेचने के लिए मंडी (बाज़ार)। तीसरे चरण का पूरा जोर इन्हीं जरूरी रास्तों को पक्का और चौड़ा करने पर है। अब लक्ष्य सिर्फ सड़क बनाना नहीं, बल्कि गाँव को शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार के केंद्रों से सीधे जोड़ना है।
गाँव की रोज़मर्रा ज़िंदगी में सुधार
जब जरूरी जगहों तक जाने वाले रास्ते सीधे और साफ हो जाते हैं, तो इसका असर हर दिन की जिंदगी पर पड़ता है। पहले, अगर गाँव में सिर्फ पांचवीं तक स्कूल था, तो आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को मीलों दूर पैदल या साइकिल से कच्चे रास्ते पर जाना पड़ता था। कई बार बेटियां इसीलिए पढ़ाई छोड़ देती थीं। अब पक्की सड़क सीधे बड़े स्कूल तक जाती है, तो बसें और वैन चलने लगी हैं। आना-जाना सुरक्षित और आसान हो गया है। छोटी-मोटी बीमारी में भी अब शहर के डॉक्टर को दिखाना मुश्किल नहीं रहा। रोज़-रोज़ की यह जो ‘किच-किच’ खत्म हुई है, उसने गाँव में रहने का अनुभव ही बदल दिया है। अब ज़िंदगी में भागदौड़ कम और सुकून ज्यादा है।
आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा
तीसरे चरण का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ता है। जब खेत से मंडी (GrAMs – ग्रामीण कृषि बाज़ार) तक का रास्ता चकाचक हो, तो किसान अपनी फसल सही समय पर और कम खर्चे में बेचने ले जा सकता है। उसे बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। सिर्फ खेती ही नहीं, गाँव में अगर कोई छोटी दुकान चलाता है, या कोई छोटा-मोटा उद्योग लगाता है, तो उसके लिए कच्चा माल लाना और तैयार माल शहर भेजना आसान हो गया है। जब आवाजाही आसान होती है, तो गाँव में नए तरह के रोजगार पैदा होते हैं। यह चरण गाँव को सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि एक ‘आर्थिक केंद्र’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
चौथा चरण: अब भी छूटे गाँवों तक पहुँच
2024 के बाद की नई योजना
साल 2024 तक आते-आते प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तीन बड़े चरण अपना काम कर चुके थे। देश के ग्रामीण नक्शे पर बहुत बदलाव आ चुका था। लेकिन, सरकार ने यह महसूस किया कि ‘सबका विकास’ का वादा तब तक अधूरा है, जब तक देश का आखिरी गाँव भी सड़क से न जुड़ जाए। विकास का सफर रुकना नहीं चाहिए। इसी सोच के साथ, 2024 के बाद इस योजना का एक नया और चौथा चरण सामने आया। यह चरण इस बात का ऐलान है कि जब तक हर घर तक रास्ता नहीं पहुँच जाता, तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेगी। यह पुरानी सफलताओं को आधार बनाकर बची हुई कसर पूरी करने की एक नई और मजबूत पहल है।
उन बसाहटों पर फोकस जहाँ आज भी सड़क नहीं
पहले के चरणों में उन गाँवों पर ज्यादा ध्यान दिया गया जहाँ आबादी ज्यादा थी या जो मुख्य रास्तों के करीब थे। इस प्रक्रिया में कई बहुत छोटी बसाहटें, दूर-दराज़ के टोले, ढाणियाँ या बेहद दुर्गम जंगलों और पहाड़ों में बसे छोटे-छोटे गाँव छूट गए थे। वहाँ के लोग 21वीं सदी में भी उसी पुरानी दुनिया में जीने को मजबूर थे, जहाँ पक्की सड़क एक सपना थी। चौथे चरण का पूरा ‘फोकस’ अब इन्हीं छूटी हुई बसाहटों पर है। अब नियम यह है कि चाहे आबादी कम हो या रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर वहाँ भारत के नागरिक बसते हैं, तो उनके दरवाजे तक भी पक्की सड़क पहुँचेगी। यह कतार में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक पहुँचने की कोशिश है।
बड़े पैमाने पर नए निर्माण की तैयारी
यह चौथा चरण सिर्फ पुरानी सड़कों की मरम्मत का नहीं है, बल्कि यह एक बार फिर से ‘नए निर्माण’ का महाअभियान है। जिन इलाकों में आज तक पगडंडी के अलावा कुछ नहीं था, वहाँ अब नए सिरे से रास्ते बनाए जाएंगे। इसके लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर तैयारी की है। भारी-भरकम बजट रखा गया है और हजारों किलोमीटर नई सड़कें बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। आने वाले दिनों में देश के उन कोनों में भी मशीनों की गड़गड़ाहट सुनाई देगी जो अब तक शांत थे। यह तैयारी बताती है कि आने वाले कुछ सालों में ग्रामीण भारत में एक बार फिर बड़े बदलाव की लहर आने वाली है।
नए गाँवों की पहचान कैसे की गई
ज़मीनी सर्वे और राज्यों की भूमिका
दिल्ली के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर यह पता लगाना नामुमकिन था कि देश के किस दूरदराज कोने में, किस पहाड़ के पीछे या जंगल के बीच कौन सा छोटा सा टोला बसा है जहाँ आज तक सड़क नहीं पहुँची। इसके लिए ‘ज़मीनी हकीकत’ जानना सबसे जरूरी था। यह जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई। राज्यों के स्थानीय अधिकारियों—पटवारी, ग्राम सेवक और ब्लॉक स्तर के इंजीनियरों—ने गाँव-गाँव जाकर सर्वे किया। उन्होंने पुरानी फाइलों से धूल झाड़ी और मौके पर जाकर देखा। सैटेलाइट तस्वीरों से मदद जरूर ली गई, लेकिन अंतिम फैसला उस अधिकारी की रिपोर्ट पर हुआ जो खुद पैदल चलकर उस बसाहट तक गया था। राज्यों की भूमिका इसमें सबसे अहम थी क्योंकि अपने इलाके का चप्पा-चप्पा वही जानते थे।
अलग-अलग राज्यों की अलग ज़रूरतें
हमारा देश इतना विशाल है कि यहाँ एक ही नियम हर जगह लागू नहीं हो सकता। राजस्थान के रेगिस्तान में लोग दूर-दूर छितरी हुई ‘ढाणियों’ में रहते हैं, जबकि केरल या पश्चिम बंगाल में घर एक-दूसरे से सटे हुए हैं। उत्तराखंड, हिमाचल या पूर्वोत्तर के पहाड़ों में तो एक गाँव से दूसरे गाँव की दूरी कुछ किलोमीटर ही होती है, लेकिन वहाँ पहुँचने में घंटों लग जाते हैं। सर्वे करते समय इस विविधता का खास खयाल रखा गया। यह समझा गया कि हर राज्य की भौगोलिक स्थिति और लोगों के बसने का तरीका अलग है। इसलिए, नए गाँवों की पहचान करते समय कोई एक सख्त ‘थंब रूल’ (अंगूठे का नियम) थोपने के बजाय, राज्यों की स्थानीय जरूरतों और उनकी वास्तविक मुश्किलों को प्राथमिकता दी गई।
अनुमान से ज़्यादा गाँव सामने आने का मतलब
जब ज़मीनी सर्वे की रिपोर्टें दिल्ली पहुँचनी शुरू हुईं, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। सरकार ने शुरू में जितना अनुमान लगाया था, असल में उससे कहीं ज्यादा ऐसी बसाहटें सामने आईं जो अब तक पक्की सड़क से महरूम थीं। कई ऐसे टोले और मजरें मिले जिनका सरकारी नक्शों में शायद सही से जिक्र भी नहीं था, लेकिन वहाँ भारत के नागरिक रह रहे थे। अनुमान से ज्यादा गाँवों का मिलना इस कड़वी सच्चाई का सबूत था कि समस्या हमारी सोच से कहीं ज्यादा गहरी थी। इसका मतलब था कि विकास की रोशनी अब भी बहुत से कोनों तक नहीं पहुँची है। इन ‘अनदेखे’ गाँवों का सामने आना यह बताता है कि इस नए चरण की कोशिश कितनी जरूरी है, ताकि कोई भी भारतीय विकास की दौड़ में पीछे न छूट जाए।
किन राज्यों में ज़रूरत सबसे ज़्यादा
ओडिशा, मध्य प्रदेश और असम की स्थिति
जब नए सर्वे के आंकड़े सामने आए, तो यह साफ हो गया कि विकास की यह लड़ाई अभी सबसे ज्यादा किन मोर्चों पर लड़ी जानी है। ओडिशा, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों का नाम इस लिस्ट में सबसे ऊपर है। कारण साफ है। ये राज्य भौगोलिक रूप से बहुत बड़े हैं और इनकी बहुत बड़ी आबादी जंगलों और दूरदराज़ के इलाकों में बसती है, खासकर हमारे आदिवासी भाई-बहन। ओडिशा के भीतरी इलाके हों, मध्य प्रदेश के घने जंगल हों, या फिर असम का बाढ़ प्रभावित और जटिल भूगोल—यहाँ आज भी हजारों ऐसी छोटी-छोटी बसाहटें हैं जहाँ तक पक्की सड़क पहुँचाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इन राज्यों में अब भी बहुत काम बाकी है और इसीलिए यहाँ सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है।
पहाड़ी और वन क्षेत्रों की चुनौतियाँ
मैदानी इलाके में सड़क बनाना और पहाड़ पर रास्ता काटना—इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। हिमालयी राज्य हों (जैसे उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर) या फिर पूर्वोत्तर भारत के घने पहाड़, यहाँ सड़क पहुँचाना लोहे के चने चबाने जैसा है। यहाँ इंसान की प्रकृति से सीधी लड़ाई होती है। कठोर चट्टानों को काटना पड़ता है, और जरा सी बारिश में भूस्खलन (लैंडस्लाइड) बना-बनाया रास्ता बहा ले जाता है। वन क्षेत्रों में पर्यावरण के कड़े कानून होते हैं, पेड़ काटने की मंजूरी मिलने में ही महीनों या सालों लग जाते हैं। इन इलाकों में एक किलोमीटर सड़क बनाने का खर्च और समय, मैदानों के मुकाबले कई गुना ज्यादा लगता है। ये विकट चुनौतियाँ ही कारण हैं कि ये इलाके आज भी सड़क के मामले में पीछे रह गए हैं।
क्षेत्रीय असमानताओं की तस्वीर
अगर आप भारत का नक्शा देखें, तो विकास की तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है। यही ‘क्षेत्रीय असमानता’ है। एक तरफ पंजाब, हरियाणा या गुजरात जैसे राज्य हैं जहाँ लगभग हर गाँव-ढ़ाणी तक चकाचक सड़कें पहुँच चुकी हैं। वहां किसान अपनी गाड़ी से सीधे खेत तक पहुँचता है। वहीं दूसरी तरफ झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई हिस्से हैं, जहाँ आज भी बरसात में कई गाँव टापू बन जाते हैं और लोग कीचड़ में चलने को मजबूर हैं। यह असंतुलन देश के लिए ठीक नहीं है। इस नए चरण का मकसद इसी खाई को पाटना है। कोशिश यह है कि विकास का सूरज सिर्फ कुछ राज्यों में न चमके, बल्कि उसकी रोशनी देश के सबसे पिछड़े कोनों तक भी बराबर पहुँचे, ताकि कोई यह न कहे कि हम भारत के सौतेले बेटे हैं।
सड़क बनने से गाँव में क्या बदला
बच्चों का स्कूल जाना आसान हुआ
सड़क न होने की सबसे बड़ी कीमत हमारे बच्चों का भविष्य चुका रहा था। गाँव में अगर पांचवीं के बाद स्कूल नहीं था, तो आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को दूर शहर या कस्बे जाना पड़ता था। कच्चे रास्ते पर पैदल या साइकिल से आना-जाना बहुत मुश्किल था, खासकर बरसात के दिनों में तो स्कूल जाना नामुमकिन हो जाता था। इस परेशानी की वजह से कई बच्चे, खासकर लड़कियां, बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती थीं। पक्की सड़क बनने से यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अब स्कूल बसें, वैन या ऑटो गाँव के अंदर तक आने लगे। आना-जाना सुरक्षित और आसान हो गया। अब माँ-बाप बेफिक्र होकर अपने बच्चों को बेहतर पढ़ाई के लिए बाहर भेजने लगे हैं। सड़क ने बच्चों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोल दिया है।
मरीजों को अस्पताल पहुँचने में राहत
बीमारी किसी से पूछकर नहीं आती। गाँव में अगर कोई अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता या किसी महिला को प्रसव पीड़ा होती, तो यह पूरे परिवार के लिए एक डरावना सपना होता था। कच्ची पगडंडी पर खाट या डोली के सहारे मरीज को मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता था। कई बार अस्पताल पहुँचने में इतनी देर हो जाती थी कि रास्ते में ही अनहोनी घट जाती थी। पक्की सड़क बनने से यह डर खत्म हुआ है। अब एक फोन पर एम्बुलेंस (108) या निजी गाड़ी सीधे घर के दरवाजे पर आ जाती है। जो सफर घंटों का था, वह मिनटों में पूरा होने लगा है। समय पर इलाज मिलने से कई जिंदगियां बची हैं। यह राहत गाँव वालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
किसान को सही दाम मिलने की संभावना
किसान साल भर मेहनत करके फसल उगाता है, लेकिन अगर वह फसल सही समय पर मंडी न पहुँचे, तो सारी मेहनत बेकार हो जाती है। कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी या ट्रैक्टर से मंडी जाने में पूरा दिन खराब होता था और भाड़ा भी ज्यादा लगता था। रास्ते में सब्जी या दूध खराब होने का डर भी रहता था। मजबूरी में किसान को गाँव के बिचौलिये को औने-पौने दाम पर अपनी उपज बेचनी पड़ती थी। पक्की सड़क ने किसान को इस लाचारी से आजादी दी है। अब वह सुबह अपनी ताज़ा फसल लेकर निकलता है और कुछ ही घंटों में सीधे शहर की बड़ी मंडी में पहुँचा देता है। उसे अपनी उपज बेचने के लिए अब किसी का मोहताज नहीं रहना पड़ता। उसे बाजार के सही दाम मिलते हैं और उसकी आमदनी बढ़ी है। सड़क ने किसान को सीधे बाजार से जोड़ दिया है।
रोज़गार और आजीविका पर असर
निर्माण कार्य से स्थानीय रोजगार
जब गाँव में सड़क बनने का काम शुरू होता है, तो उसका सबसे पहला और सीधा फायदा वहीं के लोगों को मिलता है। सड़क बनाने के लिए मशीनों के साथ-साथ मजदूरों के भी बहुत हाथ चाहिए होते हैं। गाँव के लोगों को ही मिट्टी खोदने, गिट्टी बिछाने और मजदूरी के काम में लगाया जाता है। जो लोग पहले काम की तलाश में इधर-उधर भटकते थे, उन्हें अपने घर के दरवाजे पर ही रोजगार मिल जाता है। इससे गाँव में तुरंत नकद पैसा आता है, जिससे मजदूरों और गरीब परिवारों को बड़ी राहत मिलती है। यह सड़क योजना का तात्कालिक आर्थिक लाभ है।
छोटे व्यापारों को नया रास्ता
पक्की सड़क गाँव में नए तरह के काम-धंधों के लिए रास्ते खोल देती है। जब आवाजाही आसान होती है, तो गाँव का कोई नौजवान बैंक से लोन लेकर ऑटो, जीप या छोटा लोडर टेम्पो खरीद लेता है और सवारी या माल ढोने का काम शुरू कर देता है। सड़क किनारे छोटी-मोटी दुकानें, पंक्चर बनाने की दुकान या चाय-नाश्ते के ढाबे खुलने लगते हैं। गाँव में बनी चीजें जैसे—दूध, मावा, या हस्तशिल्प का सामान—अब आसानी से शहर के बाजार तक पहुँचने लगता है, जिससे छोटे व्यापारियों की आमदनी बढ़ती है। सड़क गाँव की अर्थव्यवस्था में नई जान फूँक देती है।
पलायन पर पड़ता असर
गाँव छोड़कर शहर भागने (पलायन) की एक बड़ी वजह यह थी कि गाँव में न तो काम था और न ही शहर से जुड़ाव। लोग मजबूरी में अपना घर-बार छोड़ते थे। पक्की सड़क ने इस मजबूरी को काफी हद तक कम किया है। अब यह मुमकिन है कि गाँव का आदमी पास के कस्बे या शहर में नौकरी करे या कोई काम-धंधा करे और शाम को वापस अपने घर लौट आए। उसे शहर की महंगी और तंग जिंदगी जीने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। जब गाँव में ही कमाई के मौके और सुविधाएँ पहुँचने लगती हैं, तो लोग अपनी मिट्टी छोड़कर बाहर जाना कम पसंद करते हैं। सड़क ने गाँव के लोगों को अपने परिवार के साथ रहते हुए तरक्की करने का मौका दिया है।
खेती और बाज़ार के बीच की दूरी घटी
फसल की बर्बादी में कमी
खेती में किसान का सबसे बड़ा दुख तब होता है जब उसकी खून-पसीने से उगाई हुई फसल खेत में या रास्ते में ही सड़ जाए। पहले जब गाँव से बाहर निकलने के लिए कच्ची और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियाँ थीं, तो सब्जी, फल, फूल और दूध जैसी जल्दी खराब होने वाली चीज़ों को मंडी तक ले जाना एक बड़ी चुनौती थी। बैलगाड़ी या ट्रैक्टर घंटों हिचकोले खाते हुए पहुँचते थे। इस देरी और झटकों के कारण रास्ते में ही टमाटर पिचक जाते थे, दूध फट जाता था और सब्जियां मुरझा जाती थीं। पक्की सड़क ने इस बर्बादी पर रोक लगाई है। अब खेत से निकली ताज़ा उपज कुछ ही घंटों में बिना खराब हुए, सुरक्षित बाज़ार पहुँच जाती है। जो फसल पहले कचरा बन जाती थी, अब वह किसान की कमाई बन रही है।
परिवहन खर्च कैसे घटा
खराब रास्ते पर गाड़ी चलाना हमेशा महंगा सौदा होता है। कच्ची सड़क पर चलने में ट्रैक्टर, जीप या लोडर ज़्यादा डीज़ल पीता है, टायर जल्दी घिसते हैं और गाड़ी के पुर्ज़े बार-बार टूटते हैं। इस सबका अतिरिक्त बोझ आखिर में किसान की जेब पर ही पड़ता था। उसे अपनी ही फसल को मंडी ले जाने के लिए ज़्यादा भाड़ा (किराया) देना पड़ता था। चिकनी और पक्की सड़क बनने से यह पूरा गणित बदल गया। अब गाड़ियों में ईंधन कम लगता है, समय बचता है और मरम्मत का खर्च घट गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि माल ढुलाई का भाड़ा काफी कम हो गया है। पहले जो पैसा रास्ते के फालतू खर्च में चला जाता था, अब वह किसान की बचत के रूप में उसकी जेब में रह जाता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति
सड़क सिर्फ आने-जाने का रास्ता भर नहीं है, यह गाँव की आर्थिक नाड़ी है। जब खेत और बाज़ार के बीच की दूरी घटती है, तो इसका असर पूरे गाँव पर दिखता है। सिर्फ फसल बेचना ही नहीं, बल्कि खेती के लिए ज़रूरी खाद, बीज, और नई मशीनें शहर से गाँव लाना भी आसान और सस्ता हो जाता है। शहर के व्यापारी भी अब आसानी से गाँव की दुकानों तक अपना माल पहुँचा सकते हैं। जब आना-जाना और खरीदना-बेचना आसान होता है, तो गाँव के बाज़ार में रौनक आती है और पैसा घूमता है। छोटी दुकानों की बिक्री बढ़ती है और नए कारोबार पनपते हैं। यह सड़क गाँव की सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में नई जान फूँक देती है, जिससे तरक्की का पहिया तेज़ी से घूमने लगता है।
निर्माण में अपनाए गए नए तरीके
टिकाऊ सड़कों पर ज़ोर
पहले की सरकारी सड़कों का हाल हम सब जानते हैं। ठेकेदार डामर की पतली सी परत बिछाकर चला जाता था और पहली ही तेज बारिश में सड़क का नामोनिशान मिट जाता था। PMGSY ने इस चलन को बदलने की ठानी। अब जोर सिर्फ सड़क बनाने पर नहीं, बल्कि ऐसी सड़क बनाने पर है जो सालों-साल चले। इसके लिए सड़क की नींव को मजबूत करने पर ध्यान दिया गया। गुणवत्ता की तीन स्तरों पर कड़ी जांच होती है—ठेकेदार खुद करता है, राज्य सरकार के अधिकारी करते हैं और फिर केंद्र के इंजीनियर अचानक जांच के लिए आते हैं। अगर गड़बड़ी मिली, तो सड़क दोबारा बनानी पड़ती है। इस सख्ती का नतीजा है कि अब गाँव की सड़कें भी हाईवे जैसी टिकाऊ बनने लगी हैं।
स्थानीय और वैकल्पिक सामग्री का उपयोग
सड़क बनाने के लिए दूर से गिट्टी, रेत और डामर ढोकर लाना महंगा पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान होता है। इस योजना में नई सोच अपनाई गई—जो सामग्री आसपास आसानी से मिल जाए, उसी का इस्तेमाल करो। जैसे, कुछ इलाकों में सड़क की नींव बनाने में स्थानीय मिट्टी, पत्थरों या खदानों से निकली बेकार सामग्री का उपयोग किया जाने लगा है। इसके अलावा, नए वैज्ञानिक तरीके भी अपनाए गए। जैसे—बेकार प्लास्टिक के कचरे (Waste Plastic) को पिघलाकर डामर में मिलाना। इससे न सिर्फ प्लास्टिक के कचरे से छुटकारा मिलता है, बल्कि सड़क भी ज्यादा मजबूत और पानी प्रतिरोधी बनती है। यह ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ जैसा काम है।
पर्यावरण को नुकसान कम करने की कोशिश
सड़क बनाने के लिए अक्सर पेड़ काटने पड़ते हैं और पहाड़ों को तोड़ना पड़ता है, जिससे कुदरत को नुकसान पहुँचता है। लेकिन PMGSY में कोशिश की जाती है कि विकास की कीमत पर्यावरण को न चुकानी पड़े। अब सड़क का नक्शा (डिजाइन) इस तरह बनाया जाता है कि कम से कम पेड़ काटने पड़ें। अगर कहीं पेड़ कटते हैं, तो उसकी भरपाई के लिए नए पेड़ भी लगाए जाते हैं। ‘ग्रीन टेक्नोलॉजी’ (Green Technology) का इस्तेमाल बढ़ा है, जैसे ठंडी गिट्टी-डामर मिक्स तकनीक (Cold Mix Technology) का उपयोग, जिसमें सड़क बनाते समय डामर को बहुत ज्यादा गर्म नहीं करना पड़ता। इससे हवा में जहरीला धुआं (प्रदूषण) कम होता है और मजदूरों की सेहत भी अच्छी रहती है
सड़क बनने के बाद उसकी देखभाल
सिर्फ़ बनाना नहीं, संभालना भी ज़रूरी
हमने अक्सर देखा है कि बड़ी धूमधाम से नेताजी फीता काटकर सड़क का उद्घाटन करते हैं, लेकिन एक-दो बारिश के बाद ही उसमें बड़े-बड़े गड्ढे हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम सड़क बनाकर उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं। सच तो यह है कि सड़क बनाना सिर्फ आधा काम है; असली और मुश्किल काम उसे सालों-साल चलताऊ हालत में रखना है। जैसे आपके घर या गाड़ी को समय-समय पर मरम्मत और सर्विसिंग की जरूरत होती है, ठीक वैसे ही सड़क को भी देखभाल चाहिए। धूप, बारिश और भारी वाहनों की आवाजाही से सड़क घिसती है। अगर छोटी-सी टूट-फूट को समय पर ठीक न किया जाए, तो वह जल्द ही पूरी सड़क को बर्बाद कर देती है और गाँव वाले फिर से उसी पुरानी मुसीबत में फँस जाते हैं।
रखरखाव की ज़िम्मेदारी किसकी
पहले यह सबसे बड़ा सवाल होता था कि अगर सड़क टूटी, तो उसे ठीक कौन कराएगा? पंचायत कहती थी हमारे पास पैसे नहीं हैं, और विभाग हाथ खड़े कर देता था। PMGSY ने इस असमंजस को खत्म किया। इसमें एक बहुत साफ और कड़ा नियम बनाया गया: जिस ठेकेदार ने सड़क बनाई है, निर्माण पूरा होने के अगले पाँच साल तक उसकी देखभाल और मरम्मत की पूरी जिम्मेदारी उसी की होगी। इसे ‘डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड’ (Defect Liability Period) कहते हैं। इस दौरान अगर सड़क में एक भी गड्ढा हुआ या कोई कमी आई, तो ठेकेदार को उसे अपने खर्च पर ठीक करना होगा। पाँच साल पूरे होने के बाद, यह जिम्मेदारी राज्य सरकार के संबंधित विभाग (जैसे लोक निर्माण विभाग या ग्रामीण अभियंत्रण सेवा) के पास चली जाती है। जिम्मेदारी तय होने से अब टालमटोल की गुंजाइश कम हो गई है।
लंबे समय तक चलने वाली सड़कों की सोच
अब सरकार और नीति-निर्माताओं की सोच बदली है। वे सड़क को सिर्फ गिट्टी-तारकोल का बिछाव नहीं, बल्कि देश की एक ‘कीमती संपत्ति’ (National Asset) मानते हैं। यह समझ आ गया है कि अगर आज सड़क की मरम्मत में थोड़ा पैसा खर्च किया जाए, तो भविष्य में पूरी सड़क दोबारा बनाने का भारी-भरकम खर्च बच जाता है। इसलिए, अब सिर्फ नई सड़कें बनाने पर ही नहीं, बल्कि पुरानी सड़कों के रखरखाव के लिए भी अलग से बजट और योजना बनाई जाती है। इसे ‘एसेट मैनेजमेंट’ (Asset Management) कहते हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आज जनता के पैसे से जो बुनियादी ढांचा खड़ा किया गया है, उसका फायदा सिर्फ वर्तमान पीढ़ी को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी बिना किसी रुकावट के मिलता रहे।
अब तक की उपलब्धियाँ एक नज़र में
कितनी सड़कें बनीं
अगर हम आंकड़ों की बात करें, तो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत अब तक (जनवरी 2026 तक) देश भर में एक आश्चर्यजनक लंबाई में सड़कों का जाल बिछाया जा चुका है। यह लंबाई 7 लाख किलोमीटर से भी ज़्यादा है! ज़रा सोचिए, यह इतनी लंबी सड़क है कि अगर इसे एक सीधी रेखा में बिछाया जाए, तो यह पूरी दुनिया के कई चक्कर लगा सकती है। यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह आज़ाद भारत में ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण का अब तक का सबसे विशाल और ऐतिहासिक कार्य है। इसने भारत के ग्रामीण भूगोल को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
कितने गाँव जुड़े
सड़क सिर्फ किलोमीटर का आंकड़ा नहीं है, इसका असली मतलब है—लोगों का जुड़ना। इस योजना ने पिछले 25 सालों में उन बसाहटों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है, जो सदियों से अलग-थलग पड़ी थीं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस योजना के तहत देश भर में 1 लाख 65 हज़ार से भी ज़्यादा ग्रामीण बसाहटों (Habitations) को पक्की, बारहमासी सड़कों से जोड़ा जा चुका है। इनमें मैदानों के बड़े गाँव से लेकर पहाड़ की चोटियों, रेगिस्तान के टीलों और घने जंगलों में बसे छोटे-छोटे टोले तक शामिल हैं। लाखों लोगों के लिए यह सपना सच होने जैसा है।
ज़मीनी स्तर पर दिखता बदलाव
इन आंकड़ों का असली असर तब समझ आता है जब हम गाँव में जाकर देखते हैं। आज गाँव में आपको ऑटो-रिक्शा और छोटी गाड़ियाँ दौड़ती मिलेंगी। सुबह-सुबह बच्चे स्कूल बस का इंतज़ार करते दिखेंगे। किसान अपनी उपज को आसानी से मंडी ले जाते दिखेंगे। गर्भवती महिलाओं को डोली में टांगकर ले जाने का दुखद दृश्य अब इतिहास बन चुका है। गाँवों में पक्के मकान बन रहे हैं, छोटी दुकानें खुल रही हैं, और लोगों के चेहरे पर एक नया आत्मविश्वास है। यह बदलाव सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है, यह लोगों की जीवनशैली, सोच और अर्थव्यवस्था में आया एक गहरा और सकारात्मक बदलाव है, जिसे अब आप अपनी आँखों से महसूस कर सकते हैं।
जिन सवालों पर अभी भी काम बाकी है
गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतें
इतनी सख्त निगरानी और तीन-स्तरीय जाँच के बावजूद, ज़मीनी सच यह है कि हर जगह ‘रामराज्य’ नहीं है। आज भी कई गाँवों से शिकायतें आती हैं कि नई बनी सड़क पहली ही बारिश में उखड़ने लगी। कहीं डामर की परत पापड़ जैसी पतली होती है, तो कहीं गिट्टी तुरंत बाहर आ जाती है। इसका कारण है—स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और ठेकेदारों की मिलीभगत। कई बार शिकायत करने पर भी सुनवाई धीमी होती है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि कागजों पर सड़क जितनी मजबूत दिखती है, मौके पर हमेशा वैसी नहीं होती। गुणवत्ता के मोर्चे पर अभी भी पूरी ईमानदारी आनी बाकी है।
कुछ इलाकों में धीमी प्रगति
भले ही राष्ट्रीय स्तर पर आँकड़े शानदार हों, लेकिन देश के कुछ हिस्सों में विकास की गाड़ी अभी भी बहुत धीरे चल रही है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के कई दुर्गम आदिवासी इलाकों में आज भी सैकड़ों बसाहटें सड़क का इंतज़ार कर रही हैं। इसके कई कारण हैं—कहीं ज़मीन अधिग्रहण के विवाद सुलझ नहीं रहे, कहीं वन विभाग से मंज़ूरी मिलने में सालों लग जाते हैं, तो कहीं नक्सलवाद जैसी सुरक्षा समस्याएँ हैं। इन इलाकों में काम करने के लिए अच्छे ठेकेदार मिलना भी मुश्किल होता है। इन पिछड़े हुए इलाकों की रफ़्तार बढ़ाना सरकार के लिए अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भविष्य की चुनौतियाँ
आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती नई सड़क बनाना नहीं, बल्कि बनी हुई लाखों किलोमीटर सड़कों को बचाए रखना है। सबसे बड़ा सवाल यह है: जब ठेकेदार की 5 साल की जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी, तो क्या राज्य सरकारों के पास इनकी मरम्मत के लिए पर्याप्त बजट और सिस्टम होगा? कहीं ऐसा न हो कि रखरखाव के अभाव में हम फिर से पुराने दौर में लौट जाएं। दूसरी चुनौती है बढ़ता बोझ। गाँव की सड़कें हल्के वाहनों के लिए बनी थीं, लेकिन अब उन पर भारी-भरकम ट्रक, डंपर और बड़ी मशीनें चल रही हैं, जिससे वे समय से पहले टूट रही हैं। इन सड़कों को भविष्य के भारी ट्रैफिक और बदलते मौसम की मार के लायक बनाना एक बड़ा काम है जो अभी बाकी है।
आगे की राह क्या हो सकती है
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने पिछले ढाई दशकों में जो हासिल किया है, वह अभूतपूर्व है। लेकिन विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। एक पड़ाव पूरा होने पर अगला लक्ष्य सामने आ जाता है। ग्रामीण भारत को पूरी तरह से सशक्त और विकसित बनाने के लिए ‘आगे की राह’ इन तीन प्रमुख स्तंभों पर टिकी होगी:
बचे हुए गाँवों को जोड़ने की योजना
अब तक का सफर शानदार रहा, लेकिन मंजिल अभी पूरी नहीं मिली है। ‘आगे की राह’ का पहला और सबसे जरूरी कदम है—’अंतिम छोर’ (Last Mile Connectivity) तक पहुँचना। अब जो गाँव, टोले या मजरे बचे रह गए हैं, वे सबसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में हैं—घने जंगलों के बीच, दुर्गम पहाड़ों की ऊंचाइयों पर, या नदियों के कटान वाले इलाकों में।
भविष्य की योजना सिर्फ आंकड़ों को पूरा करने की नहीं, बल्कि उस आखिरी बसाहट तक पहुँचने की है जिसे अब तक शायद नजरअंदाज किया गया था। सरकार को अब ‘माइक्रो-प्लानिंग’ पर जोर देना होगा। सेटेलाइट और ड्रोन तकनीक की मदद से हर उस छोटे टोले को ढूंढना होगा जहाँ लोग बसे हैं। यह संकल्प लेना होगा कि भौगोलिक कठिनाई अब विकास में बाधा नहीं बनेगी। जब तक देश का आखिरी नागरिक सड़क से नहीं जुड़ जाता, विकास की यह यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी।
बेहतर रखरखाव की ज़रूरत
हमने देश भर में 7 लाख किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कों की एक विशाल ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ खड़ी कर ली है। अब सबसे बड़ी चुनौती नई सड़कें बनाना नहीं, बल्कि जो बन चुकी हैं, उन्हें बचाए रखना है। अगर रखरखाव (Maintenance) में ढील दी गई, तो अरबों रुपये की यह मेहनत और जनता का पैसा मिट्टी में मिल जाएगा।
आगे की राह में ‘निर्माण मानसिकता’ से ‘रखरखाव मानसिकता’ की ओर बढ़ना सबसे अहम होगा। सिर्फ 5 साल की ठेकेदार की गारंटी पर निर्भर रहना काफी नहीं है। इसके बाद के समय के लिए राज्य सरकारों को ठोस बजट आवंटन और एक मजबूत निगरानी सिस्टम बनाना होगा। हमें ऐसी आधुनिक तकनीक और एप्स का इस्तेमाल करना होगा जिनसे सड़क में छोटा गड्ढा होते ही विभाग को सूचना मिल जाए और वह बड़ा होने से पहले ठीक हो जाए। याद रखना होगा कि गड्ढों से भरी सड़क, विकास की रफ्तार को फिर से धीमा कर देती है।
ग्रामीण भारत को मज़बूत बनाने की दिशा
सड़क सिर्फ तारकोल और गिट्टी का बिछाव नहीं है; यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। भविष्य की दिशा यह होनी चाहिए कि ये सड़कें गाँव के लिए सिर्फ आने-जाने का रास्ता न रहें, बल्कि ‘आर्थिक गलियारे’ (Economic Corridors) बनें।
अब हमें सिर्फ संपर्क नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट और उद्देश्यपूर्ण कनेक्टिविटी’ चाहिए। आगे की राह यह है कि इन पक्की सड़कों का फायदा उठाकर गाँव में ही छोटे उद्योग-धंधे लगें, वेयरहाउस बनें और कोल्ड स्टोरेज खुलें। गाँव का किसान सिर्फ कच्चा माल शहर न भेजे, बल्कि गाँव में ही उसे प्रोसेस करके उत्पाद बनाए और इन सड़कों के जरिए दुनिया भर के बाजार में भेजे। लक्ष्य एक ऐसा ‘रर्बन’ (Rurban – Rural soul, Urban facility) भारत बनाने का होना चाहिए, जहाँ गाँव की आत्मा (हरियाली, खुलापन, शांति) बची रहे, लेकिन वहां शहर जैसी आधुनिक सुविधाएं (अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, इंटरनेट और रोजगार) मौजूद हों। तभी पलायन रुकेगा और गाँव सही मायनों में देश की ताकत बनेंगे।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY): अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
पात्रता और चयन (Eligibility)
प्रश्न 1: मेरे गाँव तक सड़क कब और कैसे पहुँचेगी? (आबादी का नियम)
अक्सर लोग पूछते हैं कि मेरे गाँव में सड़क क्यों नहीं बनी? इसका जवाब ‘जनगणना 2001’ के आंकड़ों में छिपा है। सरकार ने एक सख्त नियम बनाया है कि मैदानी इलाकों में 500 से ज़्यादा और पहाड़ी/जनजातीय इलाकों में 250 से ज़्यादा आबादी वाली बसाहटों को ही इस योजना में शामिल किया जाएगा। अगर आपका गाँव इस आबादी के दायरे में आता है और फिर भी सड़क नहीं है, तो इसका मतलब है कि वह ‘पात्र’ (Eligible) है और उस तक सड़क जरूर पहुँचेगी। लेकिन अगर आबादी इससे कम है, तो शायद उसे इस केंद्रीय योजना के बजाय किसी राज्य की योजना का इंतज़ार करना होगा।
प्रश्न 2: क्या एक ही सड़क से कई गाँवों को जोड़ा जा सकता है?
जी हाँ, कई बार ऐसा होता है कि एक सड़क रास्ते में पड़ने वाले कई छोटे-छोटे टोलों को जोड़ते हुए निकलती है। अगर एक गाँव की आबादी कम है, लेकिन वह किसी बड़ी सड़क के रास्ते में (Through Route) पड़ता है, तो उसे भी इसका फायदा मिल जाता है। योजना का मकसद एक ‘नेटवर्क’ बनाना है। इसलिए, इंजीनियर नक्शा बनाते समय यह कोशिश करते हैं कि एक ही सड़क से ज़्यादा से ज़्यादा बसाहटों को कवर किया जा सके। इसे ‘क्लस्टर अप्रोच’ भी कहा जाता है।
प्रश्न 3: क्या सांसद और विधायक अपनी मर्जी से सड़क बनवा सकते हैं?
क्या नेताजी के कहने पर सड़क बन सकती है? यह एक आम सवाल है। PMGSY में कोर नेटवर्क (Core Network) सबसे अहम होता है, जो पहले से तय होता है। लेकिन, स्थानीय सांसद (MP) और विधायक (MLA) को भी यह अधिकार दिया गया है कि वे अपने क्षेत्र की कुछ बहुत ज़रूरी सड़कों का सुझाव दे सकें। अगर कोई सड़क तकनीकी रूप से सही है और नियमों में फिट बैठती है, तो जनप्रतिनिधि की सिफारिश पर उसे प्राथमिकता सूची में ऊपर रखा जा सकता है।
गुणवत्ता और शिकायत (Quality & Complaints)
प्रश्न 4: अगर सड़क खराब बनी हो, तो आम नागरिक क्या करें?
अगर आपको लगता है कि आपके गाँव की सड़क में ठेकेदार ने गोलमाल किया है, तो आपको चुप रहने की ज़रूरत नहीं है। PMGSY की सबसे बड़ी ताकत ‘पारदर्शिता’ है। हर सड़क के शुरू और अंत में एक ‘नागरिक सूचना बोर्ड’ (Citizen Information Board) लगा होता है। उस पर सड़क की लंबाई, लागत, ठेकेदार का नाम और अधिकारियों के फोन नंबर लिखे होते हैं। आप उन नंबरों पर फोन करके सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
प्रश्न 5: ‘मेरी सड़क’ ऐप का इस्तेमाल कैसे करें?
डिजिटल इंडिया के दौर में शिकायत करना और भी आसान हो गया है। सरकार ने ‘मेरी सड़क’ (Meri Sadak) नाम से एक मोबाइल ऐप बनाया है। अगर आप सड़क पर कोई गड्ढा देखते हैं या काम खराब लग रहा है, तो बस अपने फोन से एक फोटो खींचिए और इस ऐप पर अपलोड कर दीजिए। यह शिकायत सीधे दिल्ली और राज्य मुख्यालय पहुँच जाती है। सिस्टम ऐसा है कि अधिकारी को उस शिकायत पर कार्रवाई करनी ही पड़ती है और आपको जवाब देना पड़ता है।
प्रश्न 6: शिकायत करने के बाद कार्रवाई कैसे होती है?
शिकायत मिलने के बाद, विभाग को एक तय समय सीमा के अंदर जाँच करनी होती है। अगर शिकायत सही पाई जाती है, तो ठेकेदार को आदेश दिया जाता है कि वह उस हिस्से को तोड़कर दोबारा बनाए। जब तक सड़क मानकों पर खरी नहीं उतरती, ठेकेदार को भुगतान नहीं किया जाता। गंभीर गड़बड़ी मिलने पर ठेकेदार को ‘ब्लैकलिस्ट’ भी कर दिया जाता है। आपकी जागरूकता ही सड़क की गुणवत्ता की सबसे बड़ी गारंटी है।
भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition)
प्रश्न 7: सड़क के लिए ज़मीन देने में राज्य सरकार की क्या भूमिका है?
सड़क हवा में नहीं बन सकती, उसके लिए ज़मीन चाहिए। PMGSY केंद्र की योजना है, लेकिन ज़मीन उपलब्ध कराना पूरी तरह से ‘राज्य सरकार’ की जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार सड़क बनाने का पैसा देती है, लेकिन ज़मीन का मुआवजा देने के लिए फंड नहीं देती। यह राज्य सरकारों पर निर्भर करता है कि वे ज़मीन कैसे अधिग्रहित करती हैं।
प्रश्न 8: क्या ज़मीन के बदले मुआवजा मिलता है या यह स्वैच्छिक है?
ग्रामीण भारत में एक पुरानी परंपरा रही है कि ‘गाँव के भले’ के लिए लोग अपनी थोड़ी ज़मीन खुशी-खुशी दे देते थे। ज़्यादातर मामलों में, गाँव वाले खुद आगे आकर सड़क के लिए अपनी ज़मीन दान कर देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इस सड़क से उनकी बाकी ज़मीन की कीमत कई गुना बढ़ जाएगी। इसे ‘स्वैच्छिक भू-दान’ माना जाता है। सरकार भी लोगों को समझाती है कि सड़क बनने से सबसे ज़्यादा फायदा उसी किसान को होगा जिसके खेत के बगल से सड़क निकलेगी।
प्रश्न 9: अगर ज़मीन को लेकर विवाद हो जाए तो क्या होगा?
कभी-कभी ज़मीन को लेकर विवाद हो जाता है और काम रुक जाता है। अगर कोई किसान ज़मीन देने को तैयार नहीं है, तो जबरदस्ती सड़क नहीं बनाई जाती। ऐसे में, स्थानीय प्रशासन (कलेक्टर या एसडीएम) और ग्राम पंचायत मिलकर बीच का रास्ता निकालते हैं। कई बार सड़क का नक्शा थोड़ा बदल दिया जाता है। लेकिन अगर विवाद नहीं सुलझता, तो वह सड़क रद्द भी हो सकती है, जिसका नुकसान पूरे गाँव को उठाना पड़ता है।
रखरखाव और जिम्मेदारी (Maintenance)
प्रश्न 10: सड़क बनने के बाद 5 साल तक किसकी ज़िम्मेदारी है?
बहुत से लोगों को यह पता नहीं होता। PMGSY का नियम एकदम साफ है: जिस ठेकेदार ने सड़क बनाई है, वही अगले 5 साल तक उसकी देखरेख करेगा। इसे ‘डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड’ (Defect Liability Period) कहते हैं। इन 5 सालों में, चाहे बारिश से गड्ढा हो या किनारे टूटें, ठेकेदार को अपनी जेब से उसे ठीक करना होगा। सरकार इसके लिए उसे अलग से कोई पैसा नहीं देती।
प्रश्न 11: 5 साल पूरे होने के बाद सड़क की मरम्मत कौन करता है?
जब 5 साल पूरे हो जाते हैं और ठेकेदार की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है, तब सड़क अनाथ नहीं होती। इसके बाद सड़क को संभालने का जिम्मा राज्य सरकार के हाथ में आ जाता है। यह सड़क राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) या ग्रामीण अभियंत्रण विभाग को सौंप दी जाती है। इसके बाद, इसकी मरम्मत के लिए बजट राज्य सरकार को अपने खजाने से देना होता है।
प्रश्न 12: सड़क की निगरानी में आम आदमी की क्या भूमिका है?
नियम तो अच्छे हैं, लेकिन कई बार ठेकेदार 5 साल वाली शर्त को गंभीरता से नहीं लेते। वे सोचते हैं कि गाँव में कौन देखने वाला है। अगर 5 साल के अंदर सड़क टूट रही है और ठेकेदार ठीक नहीं कर रहा, तो आपको तुरंत अधिकारियों को बताना चाहिए। अगर आप चुप रहेंगे, तो ठेकेदार अपनी जिम्मेदारी से बच निकलेगा और 5 साल बाद टूटी हुई सड़क आपके मत्थे मढ़ दी जाएगी। जागरूक रहना ही अच्छी सड़क पाने की कुंजी है।
निष्कर्ष: सड़क से बदलती किस्मत
PMGSY सिर्फ़ सड़क नहीं, अवसर है
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) को महज गिट्टी, सीमेंट और तारकोल का बिछाव मानना एक भूल होगी। यह असल में एक ‘जीवन रेखा’ है। जब एक सड़क किसी गाँव तक पहुँचती है, तो वह अपने साथ सिर्फ गाड़ियाँ नहीं लाती, बल्कि अनगिनत उम्मीदें और अवसर लेकर आती है। यह उस छात्र के लिए अवसर है जो बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता है, उस किसान के लिए अवसर है जो अपनी फसल का सही दाम चाहता है, और उस महिला के लिए अवसर है जो सुरक्षित प्रसव चाहती है। यह सड़क उस अदृश्य दीवार को गिराती है जो वर्षों से गाँव को शहर की सुविधाओं और मौकों से दूर रखे हुए थी।
गाँव को आत्मनिर्भर बनाने की नींव
सच्चा ‘आत्मनिर्भर भारत’ तभी बन सकता है जब हमारे गाँव आत्मनिर्भर हों। पक्की सड़कें इस आत्मनिर्भरता की पहली और सबसे ज़रूरी शर्त हैं। जब आवागमन सुधरता है, तो गाँव की अर्थव्यवस्था में नई जान आती है। कुटीर उद्योग, डेयरी और छोटे व्यापार फलते-फूलते हैं। सड़क ने गाँव के हुनर को बड़े बाज़ार तक पहुँचाने का रास्ता साफ किया है। इसके कारण अब गाँव का नौजवान रोज़गार के लिए शहर की ओर भागने (पलायन) को मजबूर नहीं है, बल्कि विकास के संसाधन खुद चल कर उसके दरवाज़े तक आ रहे हैं। यह स्वावलंबन की ओर बढ़ता एक मज़बूत कदम है।
विकास की वो राह जो गाँव से होकर जाती है
महात्मा गांधी ने कहा था कि “भारत की आत्मा गाँवों में बसती है।” आज के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि “भारत की तरक्की का रास्ता भी गाँवों की गलियों से ही होकर गुज़रता है।” अगर गाँव पीछे छूट गए, तो देश कभी भी सुपरपावर नहीं बन पाएगा। PMGSY ने यह साबित कर दिया है कि जब गाँव का बुनियादी ढांचा सुधरता है, तो देश की जीडीपी भी बढ़ती है और समाज भी मजबूत होता है। यह योजना सिर्फ एक सरकारी पहल नहीं, बल्कि बदलते और उभरते भारत की एक शानदार तस्वीर है, जहाँ हर रास्ता खुशहाली और बराबरी की ओर जाता है।




