“Rajasthan Gig Workers Act का बड़ा तोहफा: Ola-Uber और Delivery Boys को अब मिलेगी पेंशन और 5 लाख का बीमा – जानिए अपना हक”

गिग वर्कर्स योजना क्या है और इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी

गिग वर्कर्स योजना भारत के लाखों कामगारों के लिए एक सुरक्षा कवच है। आप अपने शहर में रोज़ाना डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर और फ्रीलांसर को देखते हैं। ये लोग गिग वर्कर्स कहलाते हैं। इनके पास कोई स्थायी ऑफिस नहीं होता। इनका काम प्रोजेक्ट या टास्क पर आधारित होता है। ये किसी एक कंपनी के पेरोल पर नहीं होते। ये काम तो करते हैं लेकिन इन्हें कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलता।

कर्मचारी का दर्जा न मिलने से इनको बड़ा नुकसान होता है। इन्हें भविष्य निधि या पीएफ का लाभ नहीं मिलता। बीमार पड़ने पर कोई पेड लीव नहीं मिलती। काम के दौरान दुर्घटना होने पर कोई बीमा सुरक्षा नहीं होती। गिग वर्कर्स योजना इसी खालीपन को भरने आई है। सरकार ने महसूस किया कि यह वर्ग पूरी तरह असुरक्षित है। इस योजना का मकसद इन कामगारों को सामाजिक सुरक्षा देना है। इसमें स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा और मातृत्व लाभ जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

आपको यह समझना होगा कि इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी। भारत में गिग इकॉनमी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में करोड़ों लोग इसी क्षेत्र में काम करेंगे। अगर इतनी बड़ी आबादी बिना किसी सुरक्षा के काम करेगी तो यह देश के लिए संकट होगा। कंपनियां अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लोगों को फुल टाइम नौकरी नहीं देतीं। वे काम के हिसाब से पैसा देती हैं। इससे कंपनी की लागत बचती है। नुकसान सिर्फ वर्कर का होता है। यह योजना कंपनियों की जवाबदेही तय करती है। अब कंपनियों को अपने मुनाफे का एक हिस्सा वर्कर्स के कल्याण फंड में देना होगा। यह एक कल्याणकारी कदम है जो सीधे आपकी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है।

भारत में बदलता कामकाज का स्वरूप

भारत में काम करने का तरीका अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले लोग एक नौकरी पकड़ते थे और पूरी जिंदगी उसी में गुज़ार देते थे। अब वह दौर चला गया है। अब तकनीक ने काम की परिभाषा बदल दी है। आपके हाथ में स्मार्टफोन है। यही अब आपका ऑफिस है। इंटरनेट की पहुंच ने काम को लोकेशन से मुक्त कर दिया है।

पहले काम का मतलब था सुबह 9 से शाम 5 बजे तक ऑफिस में बैठना। अब काम का मतलब है लॉग इन करना और टास्क पूरा करना। उबर, ओला, ज़ोमैटो और स्विगी जैसी कंपनियों ने यह बदलाव लाया है। इसे प्लेटफॉर्म इकॉनमी कहते हैं। यहाँ कोई आपका बॉस नहीं होता। आप खुद तय करते हैं कि आपको कब काम करना है। यह सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन इसके पीछे एक कड़वी सच्चाई भी है।

कामकाज के इस नए स्वरूप में स्थिरता खत्म हो गई है। आपको नहीं पता कि अगले महीने आपकी कमाई कितनी होगी। एक दिन आप बहुत पैसा कमा सकते हैं। अगले दिन शायद कुछ भी न मिले। बाज़ार की मांग ही अब आपकी कमाई तय करती है। त्यौहारों के समय काम ज्यादा होता है। आम दिनों में काम कम होता है। काम का यह स्वरूप मानसिक तनाव भी पैदा करता है। आप हमेशा अगली बुकिंग या अगले ऑर्डर के इंतज़ार में रहते हैं। भारत का युवा वर्ग इसी अनिश्चितता के बीच अपना भविष्य बना रहा है।

स्थायी नौकरी से अस्थायी काम की ओर झुकाव

लोग स्थायी नौकरी छोड़कर अस्थायी काम या गिग वर्क की तरफ क्यों जा रहे हैं। इसके कई व्यावहारिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है रोज़गार की कमी। बाज़ार में परमानेंट नौकरियां कम हो रही हैं। कंपनियों को अब स्थायी कर्मचारी रखना महंगा पड़ता है। इसलिए वे कॉन्ट्रैक्ट या टास्क आधारित काम को बढ़ावा देती हैं। जब स्थायी नौकरी नहीं मिलती तो युवा गिग वर्क को चुनते हैं।

दूसरा कारण है लचीलापन। गिग वर्क आपको अपने समय का मालिक बनाता है। छात्रों के लिए यह पॉकेट मनी कमाने का जरिया है। कुछ लोग इसे अपनी नियमित नौकरी के साथ करते हैं। इसे साइड हसल कहा जाता है। महंगाई बढ़ने के कारण एक नौकरी से घर चलाना मुश्किल हो गया है। इसलिए लोग शाम को या छुट्टी के दिन गिग वर्क करते हैं।

आपको यह भी देखना होगा कि एंट्री बैरियर बहुत कम है। गिग वर्कर बनने के लिए आपको किसी बड़ी डिग्री की ज़रूरत नहीं होती। आपके पास एक बाइक और स्मार्टफोन होना चाहिए। आप तुरंत कमाई शुरू कर सकते हैं। यह आसानी ही इस क्षेत्र में भीड़ बढ़ा रही है। लेकिन यह झुकाव एक चेतावनी भी है। यह बताता है कि देश में गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी है। लोग मजबूरी में अस्थायी काम चुन रहे हैं क्योंकि उनके पास बेहतर विकल्प नहीं हैं। गिग वर्कर्स योजना इसी मजबूरी को सुरक्षा में बदलने का एक प्रयास है।

भारत में गिग इकोनॉमी कैसे तेज़ी से फैल रही है

भारत में गिग इकोनॉमी के विस्तार की रफ्तार हैरान करने वाली है। आप अपने आसपास देखें। हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी ऐप का इस्तेमाल कर रहा है। इंटरनेट अब सस्ता है। स्मार्टफोन अब हर हाथ में है। यही दो हथियार इस अर्थव्यवस्था को ईंधन दे रहे हैं। पहले आपको प्लंबर या इलेक्ट्रीशियन खोजने के लिए बाजार जाना पड़ता था। अब आप फोन निकालते हैं और सर्विस बुक करते हैं। यह सुविधा ही इस मॉडल की ताकत है।

उपभोक्ता का व्यवहार बदल गया है। आपको अब इंतज़ार करना पसंद नहीं है। आप चाहते हैं कि सामान तुरंत आपके दरवाजे पर आए। यह मांग गिग वर्कर्स की फौज खड़ी करती है। बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां भारत के कोने-कोने में पहुंच रही हैं। उन्हें सामान पहुंचाने के लिए स्थानीय लोगों की ज़रूरत होती है। यही लोग गिग इकोनॉमी का हिस्सा बनते हैं। यह मॉडल कंपनियों को भी पसंद है। उन्हें ऑफिस नहीं खोलने पड़ते। वे सिर्फ एक ऐप के जरिए पूरे शहर को कंट्रोल करती हैं। आप इस बदलाव के गवाह हैं। यह आपकी खरीदारी और काम करने के तरीके को बदल रहा है।

ऐप आधारित सेवाओं का बढ़ता प्रभाव

ऐप आधारित सेवाएं अब आपकी दिनचर्या का हिस्सा हैं। सुबह की कैब से लेकर रात के खाने तक आप इन ऐप्स पर निर्भर हैं। यह निर्भरता ही इन कंपनियों का मुनाफा है। आप एक क्लिक करते हैं और काम हो जाता है। इसके पीछे एक जटिल सिस्टम काम करता है। ऐप आपको वर्कर से जोड़ता है। बीच में कोई मैनेजर नहीं होता। सब कुछ एल्गोरिद्म तय करता है।

इन ऐप्स ने सेवाओं का मानकीकरण कर दिया है। पहले ऑटो वाले से किराए के लिए बहस करनी पड़ती थी। अब ऐप पहले ही किराया बता देता है। इससे पारदर्शिता आती है। आपको पता होता है कि आप क्या भुगतान कर रहे हैं। वर्कर को पता होता है कि उसे क्या मिलेगा। अर्बन कंपनी जैसी सेवाओं ने घर के काम को भी प्रोफेशनल बना दिया है। अब सफाई और मरम्मत के लिए भी प्रशिक्षित लोग आते हैं। यह प्रभाव सिर्फ सुविधा तक सीमित नहीं है। यह लोगों की आदतें बदल रहा है। आप अब लाइन में खड़ा होना पसंद नहीं करते। आप डिजिटल समाधान खोजते हैं। यही बदलाव ऐप आधारित सेवाओं को शक्तिशाली बनाता है।

शहरों से कस्बों तक गिग काम का विस्तार

गिग इकोनॉमी अब सिर्फ दिल्ली या मुंबई तक सीमित नहीं है। यह छोटे शहरों और कस्बों में भी पहुंच गई है। आप जयपुर, इंदौर या पटना जैसे शहरों को देखें। वहां भी ज़ोमैटो और स्विगी के डिलीवरी पार्टनर दिखते हैं। ओला और उबर जैसी सेवाएं अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में उपलब्ध हैं। इसका कारण डिजिटल साक्षरता है। छोटे शहरों के लोग भी अब ऑनलाइन पेमेंट करना जानते हैं। वे भी ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं।

छोटे शहरों में रोजगार के मौके कम होते हैं। वहां गिग वर्क आय का एक नया साधन बना है। स्थानीय युवाओं को अपने शहर में ही काम मिल रहा है। उन्हें काम के लिए बड़े शहर नहीं जाना पड़ता। लॉजिस्टिक्स कंपनियों ने अपने नेटवर्क का विस्तार किया है। वे छोटे कस्बों तक डिलीवरी कर रही हैं। इसके लिए वे स्थानीय लोगों को ही काम पर रखती हैं। उन्हें रास्तों की जानकारी होती है। इससे डिलीवरी तेज होती है। यह विस्तार रुकने वाला नहीं है। आने वाले समय में गांव भी इस नेटवर्क से जुड़ेंगे। आपको अपने कस्बे में भी गिग इकोनॉमी का असर साफ दिखाई देगा।

गिग वर्कर किसे कहा जाता है

गिग वर्कर वह व्यक्ति है जो किसी एक कंपनी का पक्का कर्मचारी नहीं होता। आप इन्हें स्वतंत्र कामगार कह सकते हैं। ये लोग प्रोजेक्ट या टास्क के आधार पर काम करते हैं। इनका काम किसी एक मालिक तक सीमित नहीं रहता। ये एक साथ कई कंपनियों के लिए काम कर सकते हैं। स्विगी का डिलीवरी बॉय एक गिग वर्कर है। उबर का ड्राइवर एक गिग वर्कर है। घर बैठकर कंटेंट लिखने वाला फ्रीलांसर भी गिग वर्कर है।

इनकी कमाई महीने की सैलरी से नहीं होती। इन्हें हर काम के हिसाब से भुगतान मिलता है। काम पूरा हुआ और पैसा मिल गया। इनके काम करने का कोई तय समय नहीं होता। ये अपनी सुविधा के अनुसार काम चुनते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इनकी संख्या बढ़ाई है। आपके पास एक हुनर है। आप उसे बेचते हैं। यही गिग वर्क का आधार है। यह व्यवस्था पारंपरिक नौकरी से बिल्कुल अलग है। यहाँ सुरक्षा कम और लचीलापन ज्यादा है।

गिग वर्कर और नियमित कर्मचारी में फर्क

आपको इन दोनों श्रेणियों में स्पष्ट अंतर समझना चाहिए। नियमित कर्मचारी कंपनी के पेरोल पर होता है। उसे हर महीने एक निश्चित वेतन मिलता है। चाहे काम कम हो या ज्यादा, सैलरी फिक्स रहती है। गिग वर्कर की कमाई काम की मात्रा पर निर्भर करती है। आज काम नहीं किया तो आज की कमाई शून्य होगी। नियमित कर्मचारी को भविष्य निधि (पीएफ) मिलती है। उसे पेड लीव और मेडिकल इंश्योरेंस मिलता है। गिग वर्कर को ये लाभ अपने आप नहीं मिलते। उसे अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद करना पड़ता है।

नियमित कर्मचारी के काम के घंटे तय होते हैं। उसे ऑफिस के नियमों का पालन करना पड़ता है। गिग वर्कर के पास समय की आजादी होती है। वह खुद तय करता है कि कब लॉग इन करना है। लेकिन नियमित नौकरी में करियर ग्रोथ का रास्ता साफ होता है। गिग वर्क में आप सालों तक एक ही काम कर सकते हैं। नियमित कर्मचारी को निकालना मुश्किल होता है। गिग वर्कर को कंपनी कभी भी प्लेटफॉर्म से हटा सकती है। यह अंतर ही गिग वर्कर्स के लिए कानून की मांग पैदा करता है।

प्लेटफ़ॉर्म आधारित काम की वास्तविक स्थिति

बाहर से यह काम बहुत आकर्षक लगता है। आप खुद के बॉस कहलाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। आप एक अदृश्य बॉस के नीचे काम करते हैं। वह बॉस है ‘एल्गोरिद्म’। ऐप आपको बताता है कि कहाँ जाना है। ऐप तय करता है कि आपको कितना पैसा मिलेगा। आप कहने को स्वतंत्र हैं लेकिन नियंत्रण कंपनी के हाथ में होता है। कंपनियां ‘इंसेंटिव’ का लालच देती हैं। इस चक्कर में आप 12 से 14 घंटे काम करते हैं।

रेटिंग सिस्टम का दबाव हमेशा बना रहता है। ग्राहक की एक खराब रेटिंग आपकी आईडी ब्लॉक करा सकती है। गाड़ी का पेट्रोल, मरम्मत और इंटरनेट का खर्चा आपका होता है। कंपनी इन खर्चों को नहीं उठाती। महंगाई बढ़ने पर भी डिलीवरी का रेट नहीं बढ़ता। इससे आपकी असली कमाई कम हो जाती है। छुट्टियों के दिन काम का दबाव सबसे ज्यादा होता है। आप उस समय परिवार के साथ नहीं हो सकते। यही प्लेटफ़ॉर्म इकॉनमी का कड़वा सच है। यहाँ आजादी का वादा है लेकिन शर्तों की जंजीरें भी हैं।

प्लेटफ़ॉर्म और एग्रीगेटर की भूमिका क्या है

प्लेटफ़ॉर्म और एग्रीगेटर आज की गिग इकोनॉमी के डिजिटल बिचौलिए हैं। आपको यह समझना होगा कि ये कंपनियाँ पारंपरिक सेठ या मालिक की तरह काम नहीं करतीं। एग्रीगेटर का काम होता है बाज़ार की मांग को एक जगह इकट्ठा करना। उबर के पास अपनी कारें नहीं हैं। ज़ोमैटो का अपना कोई रेस्टोरेंट नहीं है। अर्बन कंपनी के पास अपने प्लंबर नहीं हैं। ये बस एक तकनीक हैं जो सेवा देने वाले और सेवा लेने वाले को मिलाती है।

इनकी मुख्य भूमिका ‘कनेक्टर’ की है। ये आपके मोबाइल में एक ऐप के रूप में मौजूद हैं। ये भरोसे का काम करते हैं। आप किसी अनजान ड्राइवर की गाड़ी में बैठने से डरते हैं। लेकिन ऐप के जरिए आप बेझिझक बैठ जाते हैं। यह भरोसा ही एग्रीगेटर की असली संपत्ति है। ये भुगतान की सुरक्षा देते हैं। ये ग्राहक को काम पूरा होने की गारंटी देते हैं। बदले में ये हर लेनदेन पर अपना कमीशन लेते हैं। यह कमीशन ही इनकी कमाई है। इन्होंने बाज़ार के बिखरे हुए कामगारों को एक डिजिटल छत के नीचे ला खड़ा किया है।

कंपनियाँ काम कैसे उपलब्ध कराती हैं

काम मिलने का पूरा तरीका अब स्वचालित हो गया है। यहाँ कोई मैनेजर आपको फोन करके काम नहीं बताता। सब कुछ ‘रियल टाइम’ में होता है। आप अपनी ऐप ‘ऑन’ करते हैं। यह सिस्टम को संकेत देता है कि आप काम के लिए तैयार हैं। उधर कोई ग्राहक ऑर्डर करता है या राइड बुक करता है। कंपनी का सॉफ्टवेयर तुरंत सक्रिय हो जाता है। वह देखता है कि ग्राहक के सबसे पास कौन सा वर्कर है।

यह सिस्टम आपकी रेटिंग और पिछले प्रदर्शन को भी देखता है। फिर आपके फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है। आपको कुछ सेकंड का समय मिलता है। आपको काम ‘स्वीकार’ करना होता है। अगर आप देर करते हैं तो काम किसी और को मिल जाता है। यह प्रक्रिया बहुत तेज़ है। इसमें मानवीय हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं है। कंपनियाँ ‘सर्ज प्राइसिंग’ का इस्तेमाल करती हैं। जब काम ज्यादा होता है और वर्कर कम, तो वे ज्यादा पैसे ऑफर करती हैं। यह लालच आपको बारिश या रात में भी काम करने के लिए प्रेरित करता है।

गिग वर्कर और प्लेटफ़ॉर्म के बीच संबंध

यह रिश्ता तकनीकी रूप से ‘साझेदारी’ का है लेकिन व्यवहार में यह जटिल है। कंपनियाँ आपको ‘पार्टनर’ कहती हैं। इसका मतलब है कि आप कर्मचारी नहीं हैं। आप उनके साथी हैं। लेकिन इस रिश्ते में बराबरी नहीं है। शर्तें हमेशा प्लेटफ़ॉर्म तय करता है। आप न तो अपनी फीस तय कर सकते हैं और न ही काम के नियम। आपको बस ऐप के निर्देशों का पालन करना होता है।

प्लेटफ़ॉर्म के पास आपको हटाने की पूरी ताकत है। इसे ‘ऑफ-बोर्डिंग’ कहते हैं। अगर आपकी रेटिंग गिरती है तो कंपनी आपको ब्लॉक कर देती है। आप अपनी सफाई नहीं दे सकते। यह एकतरफा रिश्ता है। आप अपनी गाड़ी और पेट्रोल लगाते हैं। प्लेटफ़ॉर्म केवल तकनीक देता है। जोखिम आपका होता है और मुनाफा साझा होता है। आपको कोई शिकायत हो तो आप किसी इंसान से बात नहीं कर पाते। आपको ऐप के सपोर्ट सिस्टम से जूझना पड़ता है। यह संबंध सुविधा तो देता है लेकिन इसमें आपकी आवाज़ बहुत कमजोर होती है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता की पृष्ठभूमि

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 भारतीय श्रम कानूनों के इतिहास में एक बड़ा बदलाव है। आपको यह जानना ज़रूरी है कि इससे पहले भारत में श्रम कानून बहुत बिखरे हुए थे। सरकार ने 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर 4 नई संहिताएं बनाईं। इनमें से एक सामाजिक सुरक्षा संहिता है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के हर कामगार को सुरक्षा के दायरे में लाना है।

पहली बार कानून में ‘गिग वर्कर’ और ‘प्लेटफ़ॉर्म वर्कर’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इससे पहले कानून इन शब्दों को जानता ही नहीं था। यह संहिता स्वीकार करती है कि पारंपरिक नौकरी से बाहर भी काम होता है। यह संहिता गिग वर्कर्स को कानूनी पहचान देती है। अब आप सिर्फ एक ऐप यूजर नहीं हैं। आप कानून की नज़र में एक कामगार हैं। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। कई सालों से इसकी मांग चल रही थी। संसद ने इसे पास करके कामगारों के अधिकारों को एक नई दिशा दी है। यह संहिता केंद्र और राज्य सरकारों को गिग वर्कर्स के लिए योजनाएं बनाने का अधिकार देती है।

पुराने श्रम कानूनों की सीमाएँ

पुराने श्रम कानून आज के डिजिटल दौर के लिए नहीं बने थे। वे कानून उस ज़माने के थे जब लोग कारखानों में काम करते थे। उन कानूनों की सबसे बड़ी कमी ‘कर्मचारी’ की परिभाषा थी। पुराने कानूनों के मुताबिक कर्मचारी वही था जो किसी मालिक के नियंत्रण में एक निश्चित समय पर काम करता हो। गिग वर्कर्स इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते थे। इसलिए वे कानूनी सुरक्षा से बाहर रह जाते थे।

पुराने कानूनों में भविष्य निधि (पीएफ) और ईएसआई (ESI) जैसी सुविधाएं केवल संगठित क्षेत्र के लिए थीं। अगर आपका कोई तय ऑफिस नहीं था तो कानून आपको कामगार नहीं मानता था। विवाद होने पर आपके पास लेबर कोर्ट जाने का रास्ता भी साफ नहीं था। कानून इतना जटिल था कि एक आम आदमी उसे समझ नहीं सकता था। कंपनियां इन्ही कमियों का फायदा उठाती थीं। वे वर्कर्स को ‘पार्टनर’ कह कर अपनी जिम्मेदारियों से बच जाती थीं। पुराने ढांचे में लचीले काम के लिए कोई जगह नहीं थी। यह एक पुरानी व्यवस्था थी जो नई अर्थव्यवस्था पर लागू नहीं हो सकती थी।

नए ढांचे की ज़रूरत क्यों महसूस हुई

नए ढांचे की ज़रूरत सबसे ज्यादा कोविड-19 महामारी के दौरान महसूस हुई। लॉकडाउन लगा और लाखों गिग वर्कर्स की कमाई बंद हो गई। उनके पास न कोई बचत थी और न ही कोई बीमा। सरकार मदद करना चाहती थी लेकिन उसके पास इन वर्कर्स का कोई डेटा नहीं था। सरकार को पता ही नहीं था कि कौन गिग वर्कर है और कौन नहीं। इस संकट ने सिस्टम की पोल खोल दी।

तकनीक ने काम का तरीका बदल दिया था लेकिन नियम पुराने थे। यह महसूस किया गया कि कंपनियों की जवाबदेही तय करनी होगी। सिर्फ मुनाफा कमाना काफी नहीं है। वर्कर्स की सुरक्षा भी ज़रुरी है। एक ऐसे सिस्टम की ज़रूरत थी जो डायनामिक हो। वर्कर्स एक ऐप से दूसरे ऐप पर जाते हैं। इसलिए सुरक्षा भी उनके साथ चलनी चाहिए। इसे पोर्टेबिलिटी कहते हैं। पुराने ढांचे में यह संभव नहीं था। इसलिए एक व्यापक और आधुनिक ढांचे की मांग उठी। ऐसा ढांचा जो वर्कर्स का रजिस्ट्रेशन करे और उन्हें पहचान पत्र दे। इसी ज़रूरत ने सामाजिक सुरक्षा संहिता और राजस्थान जैसे राज्यों के नए कानूनों को जन्म दिया।

गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा देने का मकसद

गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा देने का असली मकसद आपको एक सम्मानजनक जीवन देना है। अभी आप रोज कुआं खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं। अगर एक दिन आप काम पर नहीं जा पाए, तो उस दिन की कमाई खत्म। सामाजिक सुरक्षा इस डर को खत्म करती है। इसका उद्देश्य है कि जब आप काम करने की हालत में न हों, तब भी आपका जीवन चलता रहे। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि तकनीकी विकास का फायदा सिर्फ कंपनियों को न मिले।

मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी होगी। यह खैरात नहीं है। यह आपकी मेहनत का हक है। इसका मकसद आपको आर्थिक झटकों से बचाना है। जब आप काम कर रहे होते हैं, तो आप देश की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। बदले में सिस्टम को आपकी सुरक्षा करनी चाहिए। यह योजना आपको एक अदृश्य मजदूर से एक पंजीकृत कामगार बनाती है। इसका मकसद आपको यह भरोसा दिलाना है कि मुसीबत के समय सरकार और कानून आपके साथ खड़े हैं।

काम से जुड़ी असुरक्षाएँ

गिग वर्क में हर कदम पर जोखिम है। सबसे बड़ा जोखिम सड़क दुर्घटना का है। डिलीवरी पार्टनर समय पर खाना पहुंचाने की होड़ में जान जोखिम में डालते हैं। अगर दुर्घटना हो जाए, तो अस्पताल का खर्चा कौन देगा? कंपनी अक्सर पल्ला झाड़ लेती है। दूसरा जोखिम स्वास्थ्य का है। भारी बैग उठाना और घंटों बाइक चलाना आपकी कमर और रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचाता है। धूप, बारिश और प्रदूषण में लगातार काम करना आपको बीमार करता है।

मानसिक तनाव भी एक बड़ी समस्या है। आपको हमेशा अगली बुकिंग की चिंता रहती है। सबसे बड़ी असुरक्षा नौकरी की है। आपकी आईडी बिना किसी चेतावनी के ब्लॉक हो सकती है। आप रातों-रात बेरोजगार हो सकते हैं। कमाई की कोई गारंटी नहीं है। कभी हजारों रुपये मिलते हैं, तो कभी खाली हाथ लौटना पड़ता है। यह अनिश्चितता आपको हमेशा तनाव में रखती है। आप भविष्य के लिए कोई योजना नहीं बना पाते। यह असुरक्षा आपके पारिवारिक जीवन को भी प्रभावित करती है।

बीमा और भविष्य की सुरक्षा का महत्व

बीमा केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है। यह मुसीबत के समय आपका सबसे बड़ा सहारा है। जब आप बीमार पड़ते हैं, तो स्वास्थ्य बीमा आपकी जमा पूंजी को खत्म होने से बचाता है। दुर्घटना बीमा आपके परिवार को आर्थिक मदद देता है। अगर अनहोनी हो जाए, तो आपके आश्रित सड़क पर नहीं आते। आपको भविष्य के बारे में भी सोचना होगा। आप हमेशा जवान नहीं रहेंगे। गिग वर्क शारीरिक रूप से थका देने वाला काम है।

50 की उम्र के बाद आप इतनी भागदौड़ नहीं कर पाएंगे। उस समय आपको पेंशन या पीएफ की सख्त ज़रूरत होगी। छोटी-छोटी बचत ही बुढ़ापे का सहारा बनती है। सामाजिक सुरक्षा आपको यह मौका देती है। यह सुनिश्चित करती है कि जब आपके हाथ-पैर चलने बंद हो जाएं, तो भी आपका सम्मान बना रहे। भविष्य की सुरक्षा आपको आज काम करने का आत्मविश्वास देती है। इसके बिना आप सिर्फ आज के लिए जीते हैं। सुरक्षा होने पर आप आने वाले कल के लिए भी जी सकते हैं।

न्यूनतम जुड़ाव अवधि का नया नियम

सरकार ने लाभ देने के लिए एक सीमा तय की है। इसे न्यूनतम जुड़ाव अवधि कहते हैं। इसका मतलब है कि सिर्फ ऐप डाउनलोड करने से आप गिग वर्कर नहीं बन जाते। आपको एक निश्चित समय तक काम करना होगा। तभी आप सरकारी योजनाओं के हकदार बनेंगे। यह नियम असली और नकली वर्कर के बीच फर्क करता है।

सरकार देखना चाहती है कि आप इस काम पर कितने निर्भर हैं। क्या यह आपकी रोजी-रोटी का मुख्य जरिया है या आप इसे शौक के लिए कर रहे हैं। योजना का लाभ उन लोगों को मिलेगा जो नियमित रूप से काम करते हैं। आपको यह साबित करना होगा कि आप सक्रिय हैं। इसके लिए डिजिटल रिकॉर्ड का इस्तेमाल होगा। आपका लॉग-इन डेटा और पूरा किया गया काम आपकी हाजिरी माना जाएगा। यह नियम सुनिश्चित करता है कि सरकारी पैसा सही हाथों में जाए। आपको अपने काम का रिकॉर्ड रखने की चिंता नहीं करनी है। यह काम प्लेटफ़ॉर्म और सरकार का सिस्टम खुद करेगा।

90 दिन और 120 दिन की शर्त

सामाजिक सुरक्षा पाने के लिए आपको साल में कम से कम 90 दिन काम करना पड़ सकता है। यह एक मानक शर्त है। इसका सीधा मतलब है कि आपको साल के बारह महीनों में से तीन महीने सक्रिय रहना होगा। अगर आप इससे कम काम करते हैं, तो शायद आपको लाभ न मिले। यह 90 दिन लगातार होने ज़रूरी नहीं हैं। आप पूरे साल में टुकड़ों में काम करके भी यह कोटा पूरा कर सकते हैं।

कुछ विशेष और बड़े लाभों के लिए यह सीमा 120 दिन भी हो सकती है। जितना अधिक आप काम करेंगे, आपकी श्रेणी उतनी बेहतर होगी। यह शर्त उन लोगों को बाहर रखने के लिए है जो साल में सिर्फ एक-दो बार काम करते हैं। आपको अपनी सक्रियता पर ध्यान देना होगा। अगर आप लंबी छुट्टी लेते हैं, तो अपना गणित जोड़कर रखें। यह सुनिश्चित करें कि साल खत्म होने से पहले आपके खाते में ज़रूरी कार्य-दिवस जुड़ जाएं। यह संख्या ही आपकी सुरक्षा की चाबी है।

एक से अधिक प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वालों की स्थिति

अधिकतर गिग वर्कर्स एक साथ कई ऐप्स पर काम करते हैं। आप सुबह ओला चलाते हैं और शाम को रैपिडो। या आप एक ही फोन में स्विगी और ज़ोमैटो दोनों के ऑर्डर लेते हैं। नए नियमों में इसका विशेष ध्यान रखा गया है। आपके काम को टुकड़ों में नहीं देखा जाएगा। आपकी पहचान एक यूनिक आईडी से होगी।

अगर आप एक ऐप पर 50 दिन और दूसरे पर 40 दिन काम करते हैं, तो इसे कुल 90 दिन माना जाएगा। सिस्टम सभी प्लेटफ़ॉर्म से आपका डेटा इकट्ठा करेगा। यह आपके पक्ष में है। आपको किसी एक कंपनी से बंधने की ज़रूरत नहीं है। आप अपनी आज़ादी के साथ काम कर सकते हैं। आपकी कुल मेहनत ही आपकी योग्यता तय करेगी। यह प्रावधान गिग वर्क की हकीकत को समझकर बनाया गया है। अब आपको डरने की ज़रूरत नहीं है कि ऐप बदलने से आपके पुराने दिन बेकार हो जाएंगे। आपकी मेहनत का हर घंटा गिना जाएगा, चाहे वह किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर हो।

कार्य दिवसों की गिनती कैसे होगी

कार्य दिवसों की गिनती पूरी तरह से डिजिटल होगी। आपको किसी रजिस्टर में साइन करने की ज़रूरत नहीं है। आपका स्मार्टफोन ही आपकी हाजिरी लगाएगा। जब आप ऐप पर लॉग इन करते हैं, तो सिस्टम समय नोट कर लेता है। जब आप कोई ऑर्डर पूरा करते हैं या सवारी छोड़ते हैं, तो वह काम दर्ज हो जाता है। सरकार और बोर्ड मिलकर एक मानक तय करते हैं।

यह मानक घंटों पर आधारित हो सकता है या टास्क की संख्या पर। उदाहरण के लिए, 4 घंटे लॉग इन रहना या 2 ऑर्डर डिलीवर करना ‘एक दिन’ माना जा सकता है। यह डेटा सीधे कंपनी के सर्वर से कल्याण बोर्ड के पास जाएगा। इसमें कोई मानवीय गलती नहीं होगी। आपको बस अपना काम ईमानदारी से करना है। सिस्टम अपने आप आपके दिन गिनता रहेगा। आप अपनी ऐप में भी देख पाएंगे कि आपने कितने दिन काम किया है। पारदर्शिता इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा हिस्सा है।

एक दिन में कई प्लेटफ़ॉर्म पर काम का प्रभाव

आप एक ही दिन में ओला और उबर दोनों चला सकते हैं। सुबह स्विगी और शाम को ज़ोमैटो कर सकते हैं। सवाल यह है कि यह कैसे गिना जाएगा। अगर आप एक ही तारीख को दो कंपनियों के लिए काम करते हैं, तो यह ‘एक कार्य दिवस’ माना जाएगा। आप एक दिन को दो नहीं बना सकते। कैलेंडर की तारीख वही रहती है।

लेकिन इसका फायदा आपको दूसरी तरह से मिलता है। जब आप दो कंपनियों में काम करते हैं, तो दोनों कंपनियां आपके लिए कल्याण सेस या फीस जमा करती हैं। आपके फंड में पैसा दोनों तरफ से आता है। इससे आपकी सामाजिक सुरक्षा राशि बढ़ सकती है। लेकिन पात्रता के लिए दिन की गिनती एक ही रहेगी। यह नियम इसलिए है ताकि सिस्टम साफ रहे। आपको यह साबित करना है कि आप उस दिन काम कर रहे थे। चाहे एक ऐप पर हों या चार पर, आपकी सक्रियता दर्ज हो जाती है।

संचयी गणना का तरीका

संचयी गणना का मतलब है ‘जोड़ना’। इसे एग्रीगेटर लॉजिक भी कहते हैं। मान लीजिए आपने जनवरी में स्विगी पर 10 दिन काम किया। फिर आपने ज़ोमैटो पर 15 दिन काम किया। महीने के अंत में आपके कुल काम के दिन 25 माने जाएंगे। सिस्टम अलग-अलग टुकड़ों को एक साथ जोड़ देता है।

इसके लिए एक यूनिक आईडी का इस्तेमाल होता है। यह आईडी आपके आधार या मोबाइल नंबर से जुड़ी होती है। जब भी आप किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर काम करते हैं, वह डेटा आपकी यूनिक आईडी में जुड़ जाता है। यह बैंक खाते जैसा है। आप पैसा किसी भी शाखा से जमा करें, वह आपके ही खाते में दिखता है। इसी तरह आप किसी भी ऐप पर काम करें, वह आपके कुल अनुभव में जुड़ता है। यह तरीका आपको किसी एक कंपनी का गुलाम नहीं बनने देता। आप अपनी मर्जी से प्लेटफ़ॉर्म बदल सकते हैं और आपके पुराने दिन बेकार नहीं जाएंगे।

आयु सीमा और पात्रता से जुड़े नियम

गिग वर्कर्स योजना का लाभ उठाने के लिए आपको कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। सरकार ने पात्रता के स्पष्ट नियम बनाए हैं। सबसे पहली शर्त नागरिकता की है। आपको भारत का नागरिक होना चाहिए। अगर यह राज्य की योजना है, तो आपको उस राज्य का निवासी होना चाहिए। आपके पास आधार कार्ड होना अनिवार्य है। यह आपकी पहचान का सबसे बड़ा सबूत है।

दूसरी शर्त आपके काम से जुड़ी है। आपको किसी न किसी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से जुड़ा होना चाहिए। अगर आप बिना किसी ऐप के स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, तो शायद आप इस दायरे में न आएं। आपका मोबाइल नंबर आपके आधार से लिंक होना चाहिए। बैंक खाता होना भी ज़रूरी है। सरकार सारा पैसा सीधे आपके खाते में भेजेगी। आपको यह साबित करना होगा कि आप वास्तव में काम कर रहे हैं। इसके लिए ऐप का डेटा काम आता है। केवल रजिस्ट्रेशन करा लेने से आप पात्र नहीं बनते। आपको सक्रिय कामगार की श्रेणी में आना होगा।

न्यूनतम और अधिकतम आयु की शर्तें

सरकार ने इस योजना के लिए एक आयु सीमा तय की है। न्यूनतम आयु 18 वर्ष है। कानूनी रूप से 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति बालिग नहीं माना जाता। ऐप्स भी 18 से कम उम्र के लोगों को काम पर नहीं रखते। इसलिए योजना की शुरुआत ही 18 साल से होती है। आपको अपनी उम्र का सबूत देना होगा।

अधिकतम आयु सीमा आमतौर पर 60 वर्ष रखी गई है। 60 साल को रिटायरमेंट की उम्र माना जाता है। गिग वर्क शारीरिक मेहनत का काम है। उम्र बढ़ने के साथ यह काम मुश्किल हो जाता है। बीमा कंपनियां भी अधिक उम्र के लोगों को कवर देने से कतराती हैं। इसलिए 18 से 60 वर्ष के बीच का समय सबसे महत्वपूर्ण है। अगर आप 60 पार कर चुके हैं, तो आपको शायद नए रजिस्ट्रेशन का मौका न मिले। लेकिन अगर आप पहले से सदस्य हैं, तो आपको पेंशन जैसी पुरानी योजनाओं का लाभ मिल सकता है। आपको अपनी उम्र के हिसाब से ही प्रीमियम और लाभ मिलते हैं।

हर साल पात्र बने रहने की बाध्यता

यह योजना एक बार का टिकट नहीं है। आपको हर साल अपनी पात्रता साबित करनी होगी। इसे रिन्यूअल या नवीनीकरण कहते हैं। सरकार हर साल चेक करेगी कि आपने काम किया है या नहीं। अगर आपने पिछले साल 90 दिन काम किया था, तभी आपको अगले साल का कवर मिलेगा। यह नियम बहुत सख्त है।

अगर आप एक साल काम छोड़ देते हैं, तो आपकी सदस्यता निष्क्रिय हो सकती है। आपको दोबारा लाभ पाने के लिए फिर से काम शुरू करना होगा। यह बाध्यता इसलिए है ताकि केवल जरूरतमंद और सक्रिय लोगों को ही लाभ मिले। जो लोग काम छोड़ चुके हैं, वे सिस्टम पर बोझ न बनें। आपको अपने काम का रिकॉर्ड हर साल अपडेट रखना होगा। यह एक चक्र है। काम करें, पात्रता हासिल करें और सुरक्षा पाएं। आपको इसमें निरंतरता बनाए रखनी होगी। आलस या लंबी छुट्टी आपको सुरक्षा कवच से बाहर कर सकती है।

आधार से पंजीकरण क्यों अनिवार्य किया गया

आधार कार्ड आज के समय में आपकी सबसे बड़ी डिजिटल पहचान है। सरकार ने इसे अनिवार्य इसलिए किया है ताकि सही व्यक्ति की पहचान हो सके। गिग वर्कर्स की दुनिया में बहुत भीड़ है। लाखों लोग अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम कर रहे हैं। बिना आधार के सरकार के लिए यह जानना मुश्किल था कि कौन असली वर्कर है। आधार नंबर एक विशिष्ट पहचान देता है। यह किसी भी दूसरे सरकारी दस्तावेज से ज्यादा भरोसेमंद है।

आधार का सबसे बड़ा फायदा डीबीटी (Direct Benefit Transfer) में है। सरकार योजनाओं का पैसा सीधे आपके बैंक खाते में भेजना चाहती है। आधार पेमेंट ब्रिज के जरिए पैसा तुरंत ट्रांसफर होता है। इसमें कोई बिचौलिया पैसा नहीं खा सकता। अगर आपका आधार लिंक नहीं है, तो पैसा अटक सकता है। यह प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाता है। आपको बार-बार अपनी पहचान साबित करने के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। सिर्फ एक आधार नंबर से आपका पूरा सत्यापन हो जाता है। यह आपके और सरकार के बीच एक सीधा पुल है।

पहचान और रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया

पंजीकरण की प्रक्रिया को बहुत सरल और डिजिटल बनाया गया है। आपको सरकार के वेब पोर्टल या ऐप पर जाना होता है। वहाँ आप अपना आधार नंबर दर्ज करते हैं। आपके मोबाइल पर एक ओटीपी आता है। यह ओटीपी डालते ही आपकी बुनियादी जानकारी सिस्टम में आ जाती है। आपका नाम, पता और उम्र सब कुछ आधार डेटाबेस से ले लिया जाता है। आपको फॉर्म भरने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ता।

इसके बाद सिस्टम आपको एक यूनिक आईडी (Unique ID) जारी करता है। यह आईडी आपकी गिग वर्कर पहचान संख्या है। यह हमेशा आपके साथ रहती है। अब आप चाहे ओला में काम करें या ज़ोमैटो में, यह आईडी वही रहेगी। सरकार एक केंद्रीय डेटाबेस तैयार करती है। इसमें देश के हर पंजीकृत गिग वर्कर का रिकॉर्ड होता है। जब भी आप किसी कंपनी में ज्वाइन करते हैं, कंपनी इस रिकॉर्ड को अपडेट करती है। यह एक डिजिटल लेजर है जो कभी खोता नहीं है। आपका पूरा करियर इतिहास इसमें सुरक्षित रहता है।

फर्जी पंजीकरण रोकने की कोशिश

सरकारी योजनाओं में फर्जीवाड़ा एक बड़ी समस्या रही है। लोग गलत नाम से या एक ही आदमी कई बार लाभ ले लेता था। आधार आधारित पंजीकरण इसे पूरी तरह रोकता है। आधार बायोमेट्रिक्स पर आधारित है। एक व्यक्ति के पास केवल एक आधार हो सकता है। सिस्टम तुरंत पकड़ लेता है कि आपने पहले पंजीकरण कराया है या नहीं। यह डुप्लीकेशन को खत्म करता है।

सिर्फ पंजीकरण करा लेना ही काफी नहीं है। सिस्टम आपके काम के डेटा को भी क्रॉस-चेक करता है। अगर आपने पंजीकरण करा लिया लेकिन कोई काम नहीं किया, तो आप पकड़ में आ जाएंगे। प्लेटफॉर्म का डेटा और आधार का डेटा आपस में बात करते हैं। यह दोहरी जांच प्रक्रिया है। इससे ‘घोस्ट वर्कर्स’ या नकली कामगारों को बाहर रखा जाता है। यह सख्ती इसलिए ज़रूरी है ताकि योजना का पैसा केवल उन लोगों को मिले जो वास्तव में मेहनत कर रहे हैं। आपके हक का पैसा किसी धोखेबाज की जेब में नहीं जाएगा।

ई-श्रम पोर्टल का महत्व

ई-श्रम पोर्टल भारत सरकार का एक ऐतिहासिक कदम है। यह असंगठित क्षेत्र के कामगारों का पहला राष्ट्रीय डेटाबेस है। अब तक सरकार के पास गिग वर्कर्स का कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं था। सरकार को नहीं पता था कि देश में कितने लोग दिहाड़ी मजदूरी या गिग वर्क करते हैं। ई-श्रम पोर्टल ने इस अंधेरे को दूर किया है। यह पोर्टल सरकार को सही आंकड़े देता है। जब सरकार के पास सही डेटा होता है, तभी वह सही नीतियां बना पाती है।

इसका सबसे बड़ा महत्व आपको पहचान दिलाना है। इस पोर्टल पर पंजीकरण कराने के बाद आपको एक ई-श्रम कार्ड मिलता है। यह कार्ड पूरे भारत में मान्य है। इसमें 12 अंकों का एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) होता है। यह नंबर आपकी विशिष्ट पहचान है। आप बिहार के हों और महाराष्ट्र में काम कर रहे हों, यह कार्ड आपकी पहचान बताता है। यह प्रवासी मजदूरों और गिग वर्कर्स के लिए बहुत जरूरी है। यह पोर्टल भविष्य की सभी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की नींव है। सरकार अब जो भी नई योजना लाएगी, उसका लाभ इसी डेटाबेस के जरिए देगी। अगर आप इस पर पंजीकृत नहीं हैं, तो आप भविष्य के लाभों से वंचित रह सकते हैं।

e-Shram पर पंजीकरण की प्रक्रिया

पंजीकरण की प्रक्रिया को बेहद सरल और ऑनलाइन रखा गया है। आप इसे खुद अपने मोबाइल से कर सकते हैं। इसके लिए आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। सबसे पहले आपको ई-श्रम की आधिकारिक वेबसाइट (eshram.gov.in) पर जाना होगा। वहां आपको ‘Register on e-Shram’ का विकल्प मिलेगा।

आपको अपना आधार नंबर डालना होगा जो आपके मोबाइल नंबर से लिंक हो। आपके फोन पर एक ओटीपी आएगा। इसे दर्ज करते ही आपका फॉर्म खुल जाएगा। यहां आपको अपनी व्यक्तिगत जानकारी भरनी होगी। इसमें आपका नाम, पता, शैक्षणिक योग्यता और काम का विवरण शामिल है। आपको अपने बैंक खाते की जानकारी भी देनी होगी ताकि लाभ सीधे खाते में आ सके। अंत में आपको सबमिट करना होगा। सबमिट करते ही आपका ई-श्रम कार्ड तुरंत जनरेट हो जाएगा। आप इसे डाउनलोड कर सकते हैं और प्रिंट निकलवा सकते हैं। अगर आपके पास स्मार्टफोन नहीं है, तो आप नजदीकी जन सेवा केंद्र (CSC) जाकर भी पंजीकरण करवा सकते हैं।

गिग वर्कर्स को मिलने वाले लाभ

ई-श्रम कार्ड धारकों को तुरंत बीमा सुरक्षा मिलती है। पंजीकरण के साथ ही आपको प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का लाभ मिलता है। इसमें 2 लाख रुपये तक का दुर्घटना बीमा शामिल है। अगर काम के दौरान आकस्मिक मृत्यु हो जाती है, तो परिवार को 2 लाख रुपये मिलते हैं। स्थायी विकलांगता होने पर भी 2 लाख रुपये की मदद मिलती है। आंशिक विकलांगता पर 1 लाख रुपये का प्रावधान है। यह बीमा कवर एक साल के लिए मुफ्त होता है।

इसके अलावा आपातकालीन स्थितियों में यह डेटाबेस बहुत काम आता है। कोविड जैसी महामारी के दौरान सरकार ने इसी डेटाबेस के जरिए मजदूरों के खाते में नकद सहायता भेजी थी। भविष्य में राशन कार्ड और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को भी इससे जोड़ा जा सकता है। गिग वर्कर्स के लिए यह पहचान पत्र जैसा है। यह साबित करता है कि आप एक पंजीकृत कामगार हैं। यह आपको असंगठित क्षेत्र से निकालकर एक औपचारिक ढांचे में लाता है। यह कार्ड आपके बटुए में होना ही चाहिए क्योंकि यह आपकी सुरक्षा की पहली सीढ़ी है।

आयुष्मान भारत से जुड़ने की संभावना

गिग वर्कर्स के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा अब केवल सपना नहीं है। सरकार अब ई-श्रम पोर्टल के डेटा को आयुष्मान भारत योजना से जोड़ने पर काम कर रही है। इसका मतलब है कि आपका ई-श्रम कार्ड जल्द ही आपके स्वास्थ्य कवच की चाबी बन सकता है। अभी तक आयुष्मान भारत का लाभ मुख्य रूप से गरीबी रेखा से नीचे (BPL) परिवारों को मिलता था। लेकिन गिग वर्कर्स की अनिश्चित आय को देखते हुए उन्हें इस दायरे में लाने की योजना है।

यह जुड़ाव स्वचालित होगा। अगर आप एक पंजीकृत गिग वर्कर हैं, तो सिस्टम आपको खुद ही पात्र मान लेगा। आपको अलग से आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे। नीति आयोग और स्वास्थ्य मंत्रालय इस प्रस्ताव को अंतिम रूप दे रहे हैं। यह कदम स्वास्थ्य सेवा में मौजूद भेदभाव को खत्म करेगा। अभी आपको कंपनी के सीमित बीमा पर निर्भर रहना पड़ता है। वह बीमा तभी तक चलता है जब तक आप उस कंपनी के लिए काम करते हैं। आयुष्मान भारत से जुड़ने पर आपको एक स्थायी सुरक्षा मिलेगी जो कंपनी बदलने पर भी आपके साथ रहेगी।

Ayushman Bharat से स्वास्थ्य लाभ

यह योजना आपको देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य नेटवर्क का हिस्सा बनाती है। इसके तहत आपके परिवार को हर साल 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है। इसमें छोटी बीमारियों से लेकर बड़ी सर्जरी तक शामिल हैं। सबसे बड़ा फायदा कैशलेस इलाज का है। आप अस्पताल जाते हैं, अपना कार्ड दिखाते हैं और भर्ती हो जाते हैं। आपको काउंटर पर नकद जमा करने की ज़रूरत नहीं होती। सारा बिल सरकार चुकाती है।

इस योजना में सरकारी और निजी दोनों तरह के अस्पताल शामिल हैं। आप अपनी पसंद के अच्छे प्राइवेट अस्पताल में भी इलाज करा सकते हैं। इसमें अस्पताल में भर्ती होने से पहले और बाद के खर्च भी कवर होते हैं। अगर आपको पहले से कोई बीमारी है, तो उसका इलाज भी पहले दिन से मिलता है। यह सुविधा पूरे भारत में लागू है। आप काम के सिलसिले में जिस भी शहर में हों, वहां के अस्पताल में जाकर इलाज करा सकते हैं। यह पोर्टेबिलिटी गिग वर्कर्स के लिए बहुत फायदेमंद है जो अक्सर शहर बदलते रहते हैं।

इलाज और बीमा खर्च में राहत

एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बीमारी सबसे बड़ा आर्थिक झटका होती है। एक बार अस्पताल का बिल लाखों में आता है और सालों की जमा पूंजी साफ हो जाती है। गिग वर्कर्स के लिए यह जोखिम और भी बड़ा है। आपकी कमाई रोज़ की होती है। बीमारी के कारण काम छूटता है और ऊपर से इलाज का खर्चा होता है। आयुष्मान भारत आपको इस दोहरी मार से बचाता है।

प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं है। उसका सालाना प्रीमियम हजारों रुपये होता है। आयुष्मान भारत आपसे कोई प्रीमियम नहीं लेता। यह पूरी तरह से मुफ्त है। इससे आपकी मासिक बचत सुरक्षित रहती है। आप जो पैसा कमाते हैं, वह बच्चों की शिक्षा या घर के राशन पर खर्च होता है, न कि दवाइयों पर। यह योजना आपको कर्ज के जाल में फंसने से रोकती है। भारत में अधिकतर लोग इलाज के लिए कर्ज लेते हैं। यह सुरक्षा कवच आपको उस मजबूरी से बाहर निकालता है और आपको सम्मान से जीने का मौका देता है।

स्वास्थ्य, जीवन और दुर्घटना बीमा का प्रावधान

गिग वर्कर्स योजना का सबसे मजबूत हिस्सा इसका बीमा ढांचा है। सरकार ने आपकी सुरक्षा के लिए तीन तरह के कवर तैयार किए हैं। पहला है स्वास्थ्य बीमा। इसमें आपके और आपके परिवार के अस्पताल का खर्च शामिल है। दूसरा है दुर्घटना बीमा। अगर काम करते समय चोट लगती है, तो इलाज का पैसा इस फंड से मिलेगा। तीसरा है जीवन बीमा। अगर किसी कामगार की मृत्यु हो जाती है, तो उसके आश्रितों को एक मुश्त राशि मिलेगी।

यह प्रावधान एक सामाजिक सुरक्षा फंड के जरिए काम करता है। आपको अपनी जेब से प्रीमियम भरने की चिंता नहीं करनी है। एग्रीगेटर या कंपनियां अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा सरकार को देती हैं। इसे ‘सेस’ या उपकर कहते हैं। यही पैसा आपके बीमा की किस्त भरता है। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि पैसा सीधे आपके कल्याण के लिए इस्तेमाल हो। यह व्यवस्था आपको कॉर्पोरेट कर्मचारियों जैसी सुविधा देती है। अब बीमारी या दुर्घटना का मतलब आर्थिक बर्बादी नहीं होगा। यह प्रावधान कानून द्वारा बाध्यकारी है। कंपनियां इसे देने से मना नहीं कर सकतीं।

बीमा कवरेज की ज़रूरत

आपको बीमा की ज़रूरत इसलिए है क्योंकि इलाज बहुत महंगा है। आज के समय में एक छोटी सी सर्जरी का खर्च भी लाखों में जाता है। एक गिग वर्कर के रूप में आपकी कमाई सीमित है। आप रोज कमाते हैं और रोज खर्च करते हैं। आपके पास इतनी बचत नहीं होती कि आप बड़े अस्पताल का बिल भर सकें। बिना बीमा के, एक बीमारी आपको कर्ज के दलदल में धकेल सकती है।

निजी बीमा कंपनियां अक्सर गिग वर्कर्स को पॉलिसी देने से कतराती हैं। उनका प्रीमियम बहुत महंगा होता है। यह योजना उस कमी को पूरा करती है। यह आपके और गरीबी के बीच एक दीवार बनकर खड़ी है। जब आपके पास बीमा होता है, तो आप मानसिक रूप से शांत रहते हैं। आपको पता होता है कि अगर कुछ बुरा हुआ, तो कोई न कोई बैकअप मौजूद है। यह कवरेज आपके बच्चों के भविष्य की भी रक्षा करता है। अगर परिवार का कमाने वाला बिस्तर पर पड़ जाए, तो यह बीमा ही घर का राशन चलाता है।

जोखिम भरे कामों में सुरक्षा

गिग वर्क तकनीकी रूप से ‘फील्ड वर्क’ है। इसमें खतरा हमेशा बना रहता है। डिलीवरी पार्टनर सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं। आपको भारी ट्रैफिक के बीच गाड़ी चलानी होती है। 10 मिनट में डिलीवरी का दबाव आपको तेज गाड़ी चलाने पर मजबूर करता है। इससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। बारिश और खराब मौसम में भी आपको काम करना पड़ता है। सड़कें फिसलन भरी होती हैं, लेकिन ऑर्डर पहुंचाना ज़रूरी होता है।

कैब ड्राइवर रात-रात भर गाड़ी चलाते हैं। नींद की कमी और थकान से एक्सीडेंट का खतरा रहता है। इसके अलावा कई बार असामाजिक तत्वों से भी खतरा होता है। अर्बन कंपनी के वर्कर्स अजनबियों के घरों में काम करते हैं। वहां बिजली के काम या भारी सामान उठाने में चोट लग सकती है। यह काम एसी ऑफिस में बैठने जैसा सुरक्षित नहीं है। यहाँ हर पल चौकन्ना रहना पड़ता है। यह बीमा योजना इन खतरों को पहचानती है। यह मानती है कि आप अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। इसलिए सुरक्षा भी उसी स्तर की होनी चाहिए।

भविष्य में पेंशन की व्यवस्था पर विचार

गिग वर्कर्स के लिए पेंशन अब केवल चर्चा का विषय नहीं है। यह एक ठोस योजना का रूप ले रही है। सरकार जानती है कि आप हमेशा जवान नहीं रहेंगे। एक समय आएगा जब शरीर काम करने से मना कर देगा। उस समय आपको पैसों की सबसे ज्यादा ज़रूरत होगी। अभी तक गिग वर्कर्स के लिए कोई पेंशन प्लान नहीं था। आप जितना कमाते थे, उतना खर्च हो जाता था। भविष्य के लिए कुछ नहीं बचता था।

सरकार इस खालीपन को भरने की योजना बना रही है। विचार यह है कि आपको रिटायरमेंट के बाद हर महीने एक निश्चित राशि मिले। यह राशि आपको किसी के आगे हाथ फैलाने से बचाएगी। यह विचार सामाजिक सुरक्षा संहिता का एक अहम हिस्सा है। इसका मकसद आपको बुढ़ापे में सम्मान देना है। नीति निर्माता इस बात पर काम कर रहे हैं कि गिग काम की अनिश्चितता के बीच पेंशन को कैसे लागू किया जाए। यह व्यवस्था आपको एक स्थायी कर्मचारी जैसी सुरक्षा देने की दिशा में बड़ा कदम है।

योगदान आधारित पेंशन की रूपरेखा

यह पेंशन मुफ्त नहीं होगी। यह आपके और सरकार के सहयोग से चलेगी। इसे योगदान आधारित मॉडल कहते हैं। इसका गणित बहुत सरल है। आपको अपनी कमाई का एक बहुत छोटा हिस्सा हर महीने जमा करना होगा। यह राशि 50 या 100 रुपये जितनी कम हो सकती है। जितना आप देंगे, सरकार या एग्रीगेटर भी उसमें अपना हिस्सा मिलाएंगे। यह पैसा आपके पेंशन खाते में जमा होता रहेगा।

इस पर आपको ब्याज भी मिलेगा। इसे आप एक लंबी अवधि की बचत योजना समझें। आप आज थोड़ा-थोड़ा डालते हैं। जब आप 60 साल के हो जाएंगे, तो यह फंड सक्रिय होगा। तब आपको ब्याज के साथ पैसा वापस मिलेगा। यह सिस्टम प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना जैसा हो सकता है। इसमें आपकी भागीदारी ज़रूरी है। बिना आपके योगदान के यह खाता नहीं चलेगा। यह आपको आज की छोटी बचत से कल का बड़ा सहारा बनाने का मौका देता है।

बुज़ुर्गावस्था में आय का सहारा

बुढ़ापा जीवन का सबसे कठिन पड़ाव होता है। दवाइयों का खर्चा बढ़ता है और कमाई शून्य हो जाती है। ऐसे समय में मासिक पेंशन संजीवनी का काम करती है। यह आय का वह सहारा है जो कभी बंद नहीं होता। जब आपके हाथ-पैर कमजोर पड़ जाएंगे, तब यह पेंशन आपकी ताकत बनेगी। आपको अपने बच्चों या रिश्तेदारों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

आप अपनी मर्जी से अपना जीवन जी पाएंगे। यह आर्थिक आज़ादी ही असली सुरक्षा है। गिग वर्क में कोई ग्रेच्युटी या रिटायरमेंट फंड नहीं मिलता। इसलिए यह मासिक आय और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह सुनिश्चित करती है कि आपने जवानी में जो मेहनत की, उसका फल बुढ़ापे तक मिलता रहे। यह पैसा सीधे आपके बैंक खाते में आएगा। आपको अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। पेंशन केवल पैसा नहीं है, यह आपके आत्मसम्मान की गारंटी है।

राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड की भूमिका

राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड इस पूरी व्यवस्था का सुप्रीम कमांडर है। यह केवल एक सरकारी विभाग नहीं है। यह वह संस्था है जो गिग वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा करती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत इसका गठन केंद्र सरकार करती है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि कानून केवल कागज पर न रहे। यह बोर्ड ज़मीन पर योजनाओं को लागू करवाता है।

इसकी भूमिका निगरानी करने की है। यह देखता है कि एग्रीगेटर कंपनियां सही जानकारी दे रही हैं या नहीं। यह चेक करता है कि गिग वर्कर्स का पंजीकरण सही तरीके से हो रहा है या नहीं। फंड का प्रबंधन भी इसी बोर्ड की निगरानी में होता है। अगर आपको योजना का लाभ नहीं मिल रहा, तो यह बोर्ड जवाबदेही तय करता है। यह सरकार और वर्कर्स के बीच की कड़ी है। यह समय-समय पर समीक्षा करता है कि योजनाएं प्रभावी हैं या उनमें बदलाव की ज़रूरत है। बोर्ड के पास यह शक्ति है कि वह राज्य सरकारों को भी निर्देश दे सके। संक्षेप में, यह आपके कल्याण का पहरेदार है।

नीति तय करने की जिम्मेदारी

बोर्ड का सबसे महत्वपूर्ण काम सलाह देना है। यह केंद्र सरकार को बताता है कि गिग वर्कर्स के लिए कौन सी योजनाएं ज़रूरी हैं। यह तय करता है कि स्वास्थ्य बीमा की राशि कितनी होनी चाहिए। यह सिफारिश करता है कि दुर्घटना होने पर कितना मुआवजा मिलना चाहिए। बोर्ड बाजार की स्थिति का अध्ययन करता है। वह देखता है कि महंगाई कितनी बढ़ी है। उसी आधार पर वह लाभ बढ़ाने का सुझाव देता है।

नीतियां बनाते समय बोर्ड भविष्य की चुनौतियों को भी ध्यान में रखता है। वह देखता है कि गिग इकोनॉमी किस दिशा में जा रही है। अगर कल को ड्रोन से डिलीवरी शुरू होती है, तो उसके लिए नियम भी यही बोर्ड सुझाएगा। यह योजनाओं के लिए बजट का अनुमान लगाता है। यह सुनिश्चित करता है कि योजनाओं के लिए पैसे की कमी न हो। इसकी सिफारिशें बहुत वजनदार होती हैं। सरकार आमतौर पर इसके सुझावों को मानकर ही नोटिफिकेशन जारी करती है। यह बोर्ड आपकी सामाजिक सुरक्षा का आर्किटेक्ट है।

श्रमिकों और कंपनियों की भागीदारी

यह बोर्ड लोकतांत्रिक तरीके से काम करता है। इसमें केवल सरकारी बाबू नहीं बैठते। इसकी संरचना त्रिपक्षीय होती है। इसका मतलब है इसमें तीन पक्ष शामिल होते हैं। पहला पक्ष सरकार है जो नियम बनाती है। दूसरा पक्ष एग्रीगेटर या कंपनियां हैं जो काम देती हैं। तीसरा और सबसे अहम पक्ष गिग वर्कर्स के प्रतिनिधि हैं।

इसमें आपके यूनियनों के नेता शामिल होते हैं। वे आपकी समस्याओं को सीधे टेबल पर रखते हैं। कंपनियां अपनी मनमानी नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें बोर्ड के सामने जवाब देना होता है। यह भागीदारी संतुलन बनाती है। कंपनियां अपनी व्यावहारिक दिक्कतें बता सकती हैं। वर्कर्स अपनी मांगें रख सकते हैं। आमने-सामने बैठकर फैसले लिए जाते हैं। इससे विवाद कम होते हैं और समाधान जल्दी निकलता है। यह मंच आपको अपनी आवाज़ सरकार के कानों तक पहुँचाने का मौका देता है। अब फैसले बंद कमरों में नहीं, बल्कि आपकी मौजूदगी में होते हैं।

राजस्थान सरकार की गिग वर्कर्स पहल

राजस्थान सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। इसने देश को दिखाया है कि इच्छाशक्ति हो तो कामगारों की सुरक्षा संभव है। राजस्थान भारत का पहला ऐसा राज्य है जिसने गिग वर्कर्स के लिए एक अलग कानून बनाया है। इस कानून का नाम ‘राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम 2023’ है। यह केवल एक योजना नहीं है, बल्कि एक कानून है। इसका मतलब है कि अब सुरक्षा आपका कानूनी अधिकार है। सरकार बदल सकती है, लेकिन कानून आसानी से नहीं बदलता।

राजस्थान ने केंद्र सरकार के इंतजार में समय बर्बाद नहीं किया। उन्होंने महसूस किया कि लाखों युवा सड़कों पर बिना सुरक्षा के काम कर रहे हैं। इस पहल ने गिग वर्कर्स को एक अदृश्य भीड़ से निकालकर एक सम्मानित नागरिक बनाया है। राज्य सरकार ने यह संदेश दिया है कि तकनीक का विकास मजदूरों के शोषण की कीमत पर नहीं हो सकता। यह पहल पूरे देश के लिए एक मॉडल बन गई है। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्य अब राजस्थान के इस मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं। आप इसे भारत में श्रम सुधारों की एक नई शुरुआत कह सकते हैं।

राज्य स्तर पर की गई पहल

राज्य स्तर पर सबसे बड़ा काम एक समर्पित बोर्ड का गठन है। राजस्थान सरकार ने गिग वर्कर्स कल्याण बोर्ड बनाया है। यह बोर्ड सीधे श्रम मंत्री के अधीन काम करता है। इसका काम केवल फाइलों तक सीमित नहीं है। यह बोर्ड शिकायतों की सुनवाई भी करता है। अगर कोई कंपनी आपको बिना कारण हटा देती है, तो अब आप इस बोर्ड के पास जा सकते हैं। पहले आपके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। पुलिस या लेबर कोर्ट आपकी बात नहीं समझते थे। अब एक विशेष प्राधिकरण आपकी बात सुनने के लिए बैठा है।

इस कानून के तहत राज्य में काम करने वाली सभी एग्रीगेटर कंपनियों को अपना डेटा सरकार को देना होगा। उन्हें बताना होगा कि उनके साथ कितने लोग काम कर रहे हैं। राज्य सरकार एक बड़ा डेटाबेस तैयार कर रही है। इसमें हर वर्कर को एक विशिष्ट आईडी नंबर दिया जा रहा है। यह आईडी पूरे राजस्थान में मान्य है। सरकार ने इसके लिए 200 करोड़ रुपये का शुरुआती फंड भी आवंटित किया था। यह पहल कागजी घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत बदल रही है।

कल्याण कोष की व्यवस्था

सुरक्षा के लिए पैसा सबसे ज़रूरी है। राजस्थान सरकार ने इसके लिए एक बहुत ही स्मार्ट तरीका निकाला है। उन्होंने ‘कल्याण उपकर’ या वेलफेयर सेस लागू किया है। इसका नियम बहुत साफ है। जब भी कोई ग्राहक ऐप पर भुगतान करता है, तो उस राशि का एक छोटा हिस्सा सीधे कल्याण कोष में जाता है। यह एग्रीगेटर कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह इस पैसे को सरकार के पास जमा कराए।

यह पैसा आपकी जेब से नहीं कटता। यह ट्रांजैक्शन के ऊपर लगता है। मान लीजिए आपने 100 रुपये की राइड ली। इस पर एक या दो प्रतिशत का सेस लग सकता है। चूंकि हर दिन लाखों ट्रांजैक्शन होते हैं, इसलिए यह बहुत बड़ी रकम बन जाती है। यह पैसा एक सरकारी खजाने में इकट्ठा होता है। इसका इस्तेमाल केवल गिग वर्कर्स के लाभ के लिए किया जा सकता है। सरकार इसका उपयोग आपके स्वास्थ्य बीमा, बच्चों की पढ़ाई या पेंशन के लिए करती है। यह एक ऐसा मॉडल है जो खुद अपना खर्चा निकालता है। इसमें सरकार को बार-बार बजट से पैसा मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

गिग वर्कर्स का मुद्दा और राजनीतिक चर्चा

गिग वर्कर्स अब केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं हैं। आप एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं। भारत के राजनीतिक दलों को समझ आ गया है कि आपकी संख्या लाखों में है। आपके साथ आपके परिवार के वोट भी जुड़े हैं। इसलिए अब हर चुनाव में गिग वर्कर्स का जिक्र होता है। पहले घोषणापत्रों में किसानों और सरकारी कर्मचारियों की बात होती थी। अब आपके कल्याण के वादे भी सबसे ऊपर लिखे जाते हैं।

यह बदलाव लोकतंत्र की ताकत को दिखाता है। जब कोई वर्ग इतना बड़ा हो जाता है, तो राजनीति उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। पार्टियां अब आपको लुभाने की होड़ में हैं। यह आपके लिए अच्छी खबर है। जब आप राजनीति के केंद्र में आते हैं, तभी कानून बनते हैं। आपकी समस्याएं अब संसद और विधानसभाओं में गूंजने लगी हैं। यह सब आपकी एकजुटता और बढ़ती संख्या का परिणाम है। आप अब एक ‘वोट बैंक’ हैं और यही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

Rahul Gandhi और गिग वर्कर्स

राहुल गांधी ने गिग वर्कर्स की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच दिया। आपको याद होगा जब वे बेंगलुरु में एक डिलीवरी बॉय की स्कूटी पर पीछे बैठे थे। वह तस्वीर केवल एक फोटो नहीं थी। वह एक राजनीतिक संदेश था। उन्होंने सीधे वर्कर्स से बात की और उनकी तकलीफें सुनीं। उन्होंने जाना कि कैसे एक डिलीवरी के लिए जान जोखिम में डाली जाती है। उन्होंने आपकी कम कमाई और असुरक्षा के मुद्दे को उठाया।

इस मुलाकात का असर नीतियों पर दिखा। जहाँ-जहाँ उनकी पार्टी की सरकार थी, वहाँ गिग वर्कर्स के लिए कानून बनाने की पहल हुई। राजस्थान का कानून इसी सोच का नतीजा था। तेलंगाना और कर्नाटक में भी वादे किए गए। राहुल गांधी ने इसे ‘असंगठित क्षेत्र की नई गुलामी’ कहा। उनके हस्तक्षेप ने इस मुद्दे को मुख्यधारा की मीडिया में ला खड़ा किया। इससे दूसरी पार्टियों पर भी दबाव बना। जब एक बड़ा नेता आपकी बात करता है, तो पूरा सिस्टम सुनने को मजबूर हो जाता है।

नीतियों पर बढ़ता दबाव

राजनीतिक चर्चा से नीतियों पर भारी दबाव बना है। अब केंद्र सरकार और राज्य सरकारें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही हैं। इसे प्रतिस्पर्धी कल्याण राजनीति कहते हैं। अगर एक राज्य आपको बीमा देता है, तो दूसरा राज्य पीछे नहीं रह सकता। उसे भी कुछ न कुछ देना होगा। केंद्र सरकार पर सामाजिक सुरक्षा संहिता को जल्द लागू करने का दबाव है। ट्रेड यूनियनों को भी अब राजनीतिक समर्थन मिल रहा है।

पहले आपकी आवाज़ कंपनियों के ऑफिस में दब जाती थी। अब वह आवाज़ मंत्री के केबिन तक पहुँच रही है। चुनाव नजदीक आते ही नए वादों की झड़ी लग जाती है। यह दबाव ही सिस्टम को काम करने पर मजबूर करता है। सरकारें अब एग्रीगेटर कंपनियों पर सख्ती कर रही हैं। वे जानती हैं कि अगर उन्होंने वर्कर्स का पक्ष नहीं लिया, तो उन्हें चुनाव में नुकसान होगा। यह दबाव चक्र चलता रहेगा। आपको बस अपनी मांगें लगातार उठाते रहना है। राजनीति का यह दबाव ही आपके हकों की गारंटी बनेगा।

केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल की चुनौती

भारत की संघीय व्यवस्था में श्रम एक साझा विषय है। इसका मतलब है कि केंद्र और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकते हैं। यही दोहरी व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार ने 2020 में सामाजिक सुरक्षा संहिता पास कर दी। लेकिन इसे लागू करने के लिए राज्यों को अपने नियम बनाने थे। यहीं पर मामला अटक गया है। तालमेल की भारी कमी दिखाई देती है। आप इस खींचतान का शिकार हो रहे हैं।

सबसे बड़ा विवाद पैसे को लेकर है। राज्य सरकारें चाहती हैं कि केंद्र फंडिंग का बड़ा हिस्सा उठाए। केंद्र सरकार कहती है कि राज्यों को अपने संसाधनों से व्यवस्था करनी चाहिए। सेस या टैक्स कौन वसूलेगा, इस पर भी सहमति नहीं है। अगर आप एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करते हैं, तो क्या होगा? क्या आपका फंड ट्रांसफर होगा? इन सवालों पर केंद्र और राज्यों के बीच स्पष्ट बात नहीं हुई है। यह संवादहीनता योजना को जमीन पर उतरने से रोक रही है। आपको एक राष्ट्रीय नीति की ज़रूरत है, लेकिन आपको मिल रहे हैं टुकड़ों में बंटे हुए नियम।

नियम लागू करने में देरी

संसद ने कानून 2020 में पास किया था। आज कई साल बीत चुके हैं। फिर भी आप इसका पूरा लाभ नहीं ले पा रहे हैं। यह देरी नौकरशाही की सुस्ती को दिखाती है। ड्राफ्ट नियम बनकर तैयार हैं, लेकिन अंतिम मुहर नहीं लगी है। सरकारें चुनाव का इंतज़ार करती हैं। वे इसे चुनावी वादे की तरह इस्तेमाल करना चाहती हैं। इस राजनीति में आपका कीमती समय बर्बाद हो रहा है।

कंपनियों की लॉबिंग भी देरी का एक बड़ा कारण है। एग्रीगेटर कंपनियां नहीं चाहतीं कि उनकी लागत बढ़े। वे सरकारों पर दबाव डालती हैं कि नियमों को नरम किया जाए। वे तकनीकी पेच फंसाती हैं। कभी डेटा शेयरिंग का बहाना, तो कभी मुनाफे का रोना। सरकारें कंपनियों और वोट बैंक के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं। यह हिचकिचाहट फाइलों को आगे नहीं बढ़ने देती। आपको यह समझना होगा कि हर दिन की देरी का मतलब है लाखों लोगों का असुरक्षित रहना।

राज्यों की तैयारियों की स्थिति

तैयारियों के मामले में भारत एक जैसा नहीं है। कुछ राज्य बहुत आगे निकल गए हैं। राजस्थान ने अपना कानून बनाकर और बोर्ड गठित करके लीड ली है। वहां काम शुरू हो चुका है। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों ने भी मसौदा तैयार कर लिया है। वे इसे लागू करने के करीब हैं। लेकिन कई बड़े राज्यों में अभी सन्नाटा है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में गिग वर्कर्स की बड़ी संख्या है। वहां अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

सबसे बड़ी समस्या डेटाबेस के एकीकरण की है। केंद्र के पास ई-श्रम का डेटा है। राज्यों के पास अपने लेबर विभाग का डेटा है। ये दोनों सिस्टम आपस में बात नहीं कर रहे हैं। बिना डेटा के योजना लागू नहीं हो सकती। राज्यों के पास अभी तक रजिस्ट्रेशन के लिए पोर्टल तैयार नहीं हैं। फंड इकट्ठा करने का मैकेनिज्म भी नहीं बना है। स्थिति यह है कि कानून है, लेकिन उसे चलाने वाला तंत्र गायब है। आपको अपने स्थानीय प्रतिनिधियों से सवाल पूछना होगा कि आपका राज्य पीछे क्यों है।

कंपनियों पर पड़ने वाला आर्थिक असर

एग्रीगेटर कंपनियों का पूरा बिजनेस मॉडल ‘कम लागत’ पर टिका है। वे आपको कर्मचारी नहीं मानते ताकि पीएफ और बीमा का पैसा बचा सकें। यह योजना उस गणित को बिगाड़ रही है। कंपनियों को अब अपनी जेब ढीली करनी होगी। उनके लिए यह एक बड़ा आर्थिक झटका है। अब तक वे सारा मुनाफा खुद रख रहे थे। अब उन्हें उसे आपके साथ बांटना होगा।

कंपनियों को डर है कि इससे भारत में उनका कारोबार करना महंगा हो जाएगा। स्टार्टअप्स के लिए यह मुश्किल घड़ी है। वे अभी मुनाफे में नहीं हैं और उन पर नया खर्च आ गया है। निवेशक इससे खुश नहीं होंगे। लेकिन सामाजिक न्याय के लिए यह जरूरी है। कंपनियों को अब मान लेना होगा कि सस्ता श्रम का दौर खत्म हो गया है। वे तकनीक के पीछे छिपकर अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकतीं। अब उन्हें आपको एक संसाधन नहीं, बल्कि इंसान समझना होगा जिसकी सुरक्षा की कीमत होती है।

सामाजिक सुरक्षा फंड में योगदान

कानून के मुताबिक कंपनियों को अपने टर्नओवर या लेनदेन पर एक निश्चित प्रतिशत देना होगा। इसे ‘कल्याण उपकर’ कहते हैं। राजस्थान के कानून में यह राशि एग्रीगेटर के टर्नओवर का 1 से 2 प्रतिशत तक हो सकती है। सुनने में यह कम लगता है। लेकिन जब करोड़ों ट्रांजैक्शन होते हैं, तो यह अरबों रुपये बन जाता है। यह पैसा सीधे कंपनियों के बैंक खाते से कल्याण बोर्ड के पास जाएगा।

कंपनियों के लिए यह एक नया टैक्स है। वे इसे देने से बच नहीं सकतीं। सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी है। हर बुकिंग का हिसाब रखा जाता है। अगर कंपनी योगदान नहीं देती है, तो उस पर भारी जुर्माना लग सकता है। यह योगदान ही आपकी सुरक्षा का आधार है। यह दान नहीं है, यह कानून है। कंपनी कमाएगी तो उसे आपको सुरक्षा भी देनी होगी। यह पैसा सरकार अपने पास नहीं रखती। यह सीधे आपके कल्याण कोष में जमा होता है।

परिचालन लागत में बढ़ोतरी

सिर्फ फंड में पैसा देना ही खर्चा नहीं है। इस सिस्टम को लागू करने में भी पैसा लगता है। कंपनियों को अपना सॉफ्टवेयर बदलना होगा। उन्हें सरकार के साथ डेटा शेयर करने के लिए नई तकनीक लगानी होगी। इसके लिए उन्हें नई टीमें बनानी पड़ेंगी। वकीलों और सीए का खर्चा भी बढ़ेगा। इसे अनुपालन लागत या ‘कंप्लायंस कॉस्ट’ कहते हैं। यह कंपनियों के लिए सिरदर्द है।

कंपनियां यह बोझ खुद नहीं उठाना चाहेंगी। डर इस बात का है कि वे कीमतें बढ़ा सकती हैं। आपकी डिलीवरी या राइड महंगी हो सकती है। या फिर वे आपके इंसेंटिव कम कर सकती हैं। वे कोशिश करेंगी कि उनका मुनाफा कम न हो। इसका असर अंत में ग्राहक या आप पर ही पड़ेगा। लेकिन लंबी अवधि में यह स्थिरता लाएगा। जब वर्कर खुश और सुरक्षित होगा, तो वह बेहतर सेवा देगा। कंपनियों को इसे खर्च नहीं बल्कि निवेश के रूप में देखना चाहिए।

गिग आधारित कंपनियों के सामने नई चुनौतियाँ

गिग आधारित कंपनियों के लिए ‘खुली छूट’ का दौर अब खत्म हो रहा है। अब तक ये कंपनियाँ तकनीक की आड़ में नियमों से बचती रही थीं। वे खुद को केवल एक ‘माध्यम’ बताती थीं। उनका कहना था कि वे रोजगार नहीं देतीं, बस काम दिलाती हैं। लेकिन अब यह तर्क नहीं चल रहा। सरकारों और अदालतों ने इन पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। इनके सामने अस्तित्व का संकट नहीं, लेकिन पहचान का संकट जरूर है।

सबसे बड़ी चुनौती जवाबदेही की है। पहले अगर किसी वर्कर के साथ कुछ गलत होता था, तो कंपनी पल्ला झाड़ लेती थी। अब उन्हें जिम्मेदारी लेनी पड़ रही है। वैश्विक स्तर पर भी दबाव है। यूरोप और अमेरिका में भी ऐसे ही कानून बन रहे हैं। भारत की कंपनियाँ भी उस लहर से अछूती नहीं हैं। उन्हें अब मुनाफा और नैतिकता के बीच संतुलन बनाना होगा। यह काम आसान नहीं है। उनका पूरा ढांचा ‘न्यूनतम जिम्मेदारी’ पर खड़ा था। अब उन्हें ‘अधिकतम सुरक्षा’ की ओर बढ़ना पड़ रहा है।

नियमों का पालन

नियमों का पालन या ‘कंप्लायंस’ अब इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। नए कानूनों के तहत उन्हें रियल टाइम डेटा साझा करना होता है। ये कंपनियाँ अपने डेटा को अपनी सबसे बड़ी संपत्ति मानती हैं। वे नहीं चाहतीं कि किसी को पता चले कि उनका एल्गोरिद्म कैसे काम करता है। लेकिन सरकार अब पारदर्शिता मांग रही है। उन्हें बताना होगा कि वे किस आधार पर ऑर्डर बांटती हैं।

उन्हें हर राज्य के अलग-अलग नियमों से जूझना पड़ रहा है। राजस्थान के नियम अलग हैं, कर्नाटक के अलग हो सकते हैं। एक राष्ट्रीय कंपनी के लिए हर राज्य में अलग सिस्टम बनाना बहुत मुश्किल है। इसके लिए उन्हें बड़ी कानूनी टीमों की ज़रूरत पड़ती है। अगर वे चूक करते हैं, तो भारी जुर्माने का प्रावधान है। पहले वे नियमों की कमियों का फायदा उठाती थीं। अब नियम स्पष्ट हैं और बचने का रास्ता बंद है। यह सख्ती उन्हें अनुशासित कर रही है।

बिज़नेस मॉडल में बदलाव

इन कंपनियों का बिज़नेस मॉडल सस्ते श्रम पर टिका था। वे आपको सस्ता पिज्जा या सस्ती राइड इसलिए दे पाती थीं क्योंकि वर्कर को कम पैसा मिलता था। अब जब वर्कर की सुरक्षा पर खर्च करना होगा, तो यह सस्ता मॉडल टूट सकता है। कंपनियों को कमाई के नए रास्ते खोजने होंगे। वे अब केवल कमीशन पर निर्भर नहीं रह सकतीं।

आप देखेंगे कि कंपनियाँ अब ‘सब्सक्रिप्शन’ मॉडल पर जोर दे रही हैं। वे ग्राहकों से मेंबरशिप फीस ले रही हैं। वे विज्ञापनों से पैसा कमा रही हैं। मकसद है कि वर्कर की लागत बढ़ने के बावजूद मुनाफा कम न हो। उन्हें अपनी संचालन लागत कम करनी होगी। वे ऑटोमेशन और एआई का ज्यादा इस्तेमाल करेंगी। यह बदलाव ज़रूरी है। अगर वे नहीं बदलतीं, तो उनका बाजार में टिकना मुश्किल होगा। निवेशक अब केवल ग्रोथ नहीं, बल्कि टिकाऊ मॉडल देखना चाहते हैं। गिग इकोनॉमी का अगला चरण वही कंपनी जीतेगी जो कानून का पालन करते हुए भी मुनाफा कमा सके।

गिग वर्कर्स के लिए इस योजना का क्या मतलब है

यह योजना आपके लिए केवल सरकारी कागज नहीं है। यह आपकी पहचान का प्रमाण है। अब तक आप सिस्टम के लिए अदृश्य थे। आप काम करते थे लेकिन आपकी गिनती नहीं होती थी। यह योजना आपको वह दर्जा देती है जिसके आप हकदार हैं। इसका मतलब है कि आप अब लाचार नहीं हैं। आपके पास कानून की ताकत है।

यह बदलाव आपकी जिंदगी की गुणवत्ता सुधारता है। पहले आप दिन काटने के लिए काम करते थे। अब आप भविष्य बनाने के लिए काम करेंगे। यह योजना आपको मुख्यधारा में लाती है। आप बैंक से लोन ले सकते हैं क्योंकि आपके पास सरकारी पहचान है। समाज में आपका सम्मान बढ़ता है। लोग अब आपको एक पेशेवर कामगार की नज़र से देखेंगे। यह योजना आपके पसीने की असली कीमत लगाती है।

सुरक्षा और भरोसे की भावना

पहले आप डर में जीते थे। एक्सीडेंट का डर, बीमारी का डर और बुढ़ापे का डर आपको सताता था। यह योजना उस डर को भरोसे में बदलती है। जब आप सुबह सड़क पर निकलते हैं, तो आपको पता होता है कि एक सुरक्षा कवच आपके साथ है। अगर कुछ गलत हुआ, तो सरकार और बोर्ड आपके साथ खड़े हैं। यह भरोसा आपको मानसिक शांति देता है।

आप अपने परिवार की आंखों में देख सकते हैं। आप उन्हें बता सकते हैं कि अगर आपको कुछ हो गया, तो वे भूखे नहीं मरेंगे। यह भरोसा ही सबसे बड़ी दौलत है। आप कंपनियों पर भी अब ज्यादा भरोसा कर पाएंगे। आपको पता है कि वे कानून से बंधी हैं। वे आपके पैसे के साथ धोखा नहीं कर सकतीं। यह व्यवस्था शक को खत्म करती है और एक मजबूत रिश्ता बनाती है।

काम करने की बेहतर स्थिति

अब कंपनियां आपको मनमाने ढंग से नहीं दबा सकतीं। आपकी शिकायत सुनने वाला कोई है। काम के घंटे और भुगतान में पारदर्शिता आएगी। आपको पता होगा कि आपकी मेहनत का पैसा कहाँ जा रहा है। एल्गोरिद्म की मनमानी पर लगाम लगेगी। आपको कारण बताए बिना आईडी ब्लॉक नहीं किया जाएगा। आपको अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।

बुनियादी सुविधाएं भी सुधरेंगी। आपको आराम करने की जगह और साफ पानी जैसी सुविधाएं मांगनी नहीं पड़ेंगी। यह आपका हक बन जाएगा। काम का माहौल अब तनावपूर्ण नहीं, बल्कि सम्मानजनक होगा। आप सिर उठाकर काम कर पाएंगे। यह योजना सुनिश्चित करती है कि आप मशीन की तरह नहीं, बल्कि इंसान की तरह काम करें।

असंगठित से संगठित क्षेत्र की ओर कदम

यह कदम भारत की श्रम व्यवस्था में एक क्रांति है। आप अभी तक ‘असंगठित’ भीड़ का हिस्सा थे। असंगठित का मतलब है जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं, कोई नियम नहीं और कोई माई-बाप नहीं। धोबी, मोची और रिक्शा वाले इसी श्रेणी में आते थे। गिग वर्कर्स भी इसी में गिने जाते थे। लेकिन यह योजना आपको उस अंधेरे से बाहर निकाल रही है। संगठित क्षेत्र का मतलब है जहाँ कानून चलता है।

अब आप एक रजिस्टर्ड वर्कफोर्स हैं। आपके पास दस्तावेज हैं। आप सिस्टम का हिस्सा हैं। यह बदलाव आपको बैंकिंग और क्रेडिट सिस्टम से जोड़ता है। बैंक अब आपको लोन देने से पहले सौ बार नहीं सोचेगा। क्योंकि सरकार के पास आपका डेटा है। यह कदम आपको मजदूर से ‘प्रोफेशनल’ की श्रेणी में ले जाता है। आप अब केवल दिहाड़ी कमाने वाले नहीं हैं। आप एक व्यवस्थित ढांचे के सदस्य हैं। यह सम्मान की बात है। यह बदलाव बताता है कि देश अब अपनी श्रम शक्ति की कदर करना सीख रहा है।

गिग इकोनॉमी का औपचारिक रूप

गिग इकोनॉमी अब ‘जुगाड़’ नहीं रही। यह एक गंभीर व्यवसाय बन गई है। पहले इसे केवल पॉकेट मनी कमाने का जरिया माना जाता था। अब यह लाखों घरों का चूल्हा चला रही है। औपचारिकता या फॉर्मलाइजेशन का मतलब है कि अब खेल के नियम तय हैं। कंपनियां अपनी मर्जी से नियम नहीं बदल सकतीं।

सरकार ने इसे एक उद्योग का दर्जा देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसका फायदा यह है कि अब विवादों का निपटारा सड़कों पर नहीं, कोर्ट में होगा। कॉन्ट्रैक्ट साफ और लिखित होंगे। छिपी हुई शर्तें खत्म होंगी। यह स्पष्टता निवेश को भी बढ़ावा देती है। विदेशी निवेशक भी ऐसी जगह पैसा लगाना पसंद करते हैं जहाँ नियम साफ हों। इससे सेक्टर में और पैसा आएगा। नई कंपनियां आएंगी। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और अंत में फायदा आपको ही होगा। यह जंगल राज का अंत और कानून के राज की शुरुआत है।

अर्थव्यवस्था पर इसका असर

जब आप सुरक्षित होते हैं, तो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। यह बहुत सीधा गणित है। अगर आपके पास बीमा और पेंशन है, तो आप अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा खर्च करेंगे। आप डरे हुए नहीं होंगे। आप मोटरसाइकिल खरीदेंगे, घर बनवाएंगे या बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजेंगे। यह खर्च बाजार में मांग पैदा करता है। मांग से उत्पादन बढ़ता है और देश की जीडीपी ऊपर जाती है।

असुरक्षित वर्कर पैसा दबा कर रखता है। सुरक्षित वर्कर पैसा बाजार में घुमाता है। यह योजना भारत की खपत आधारित अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगी। सरकार का टैक्स कलेक्शन भी बढ़ेगा। जब सब कुछ ऑनलाइन और रिकॉर्ड पर होगा, तो सिस्टम में पारदर्शिता आएगी। काले धन और नकदी का चलन कम होगा। यह भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने में मदद करेगा। आपकी सुरक्षा केवल आपका भला नहीं कर रही। यह देश के पहिये को भी रफ्तार दे रही है। आप राष्ट्र निर्माण में एक भागीदार बन रहे हैं।

अन्य देशों में गिग वर्कर्स के लिए नियम

गिग वर्कर्स की लड़ाई सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। पूरी दुनिया में आपके जैसे कामगार हकों की मांग कर रहे हैं। अमेरिका से लेकर यूरोप तक सरकारें जागी हैं। ब्रिटेन में एक बड़ा बदलाव आया। वहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उबर ड्राइवर सिर्फ पार्टनर नहीं हैं। उन्हें ‘वर्कर’ का दर्जा दिया गया। इसका मतलब है उन्हें न्यूनतम वेतन और छुट्टी के पैसे मिलेंगे।

स्पेन ने ‘राइडर लॉ’ पास किया। वहां कंपनियों को बताना पड़ता है कि उनका एल्गोरिद्म कैसे काम करता है। अगर ऐप आपको कंट्रोल करता है, तो कंपनी को आपको नौकरी पर रखना होगा। कैलिफोर्निया में भी लंबी लड़ाई चली। वहां कंपनियों ने आपको स्वतंत्र रखने के लिए करोड़ों खर्च किए। लेकिन बदले में उन्हें कुछ स्वास्थ्य लाभ देने पड़े। यह वैश्विक बदलाव बताता है कि पुराना सिस्टम अब नहीं चलेगा। दुनिया मान रही है कि तकनीक के नाम पर शोषण नहीं हो सकता।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव

विदेशों के अनुभव से हमें बहुत कुछ पता चलता है। यूरोपीय संघ (EU) ने एक सख्त रुख अपनाया है। उनका नियम है ‘प्रिजम्पशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट’। मतलब अगर कंपनी आपके काम के घंटे तय करती है, तो आप कर्मचारी हैं। इसे साबित करने की जिम्मेदारी कंपनी की है, आपकी नहीं। यह कानून वर्कर्स को बहुत ताकत देता है।

चीन में भी सरकार ने सख्ती दिखाई है। वहां डिलीवरी ऐप्स पर लगाम लगाई गई। कंपनियों को आदेश दिया गया कि वे ड्राइवरों को न्यूनतम वेतन से कम नहीं दे सकतीं। उन्हें सामाजिक बीमा देना अनिवार्य कर दिया गया। सिंगापुर ने एक अलग मॉडल चुना। उन्होंने रिटायरमेंट सेविंग पर जोर दिया। वहां गिग वर्कर्स को अपनी कमाई का हिस्सा केंद्रीय भविष्य निधि (CPF) में डालना होता है। यह मॉडल भविष्य की सुरक्षा करता है। हर देश अपने तरीके से समाधान खोज रहा है। लेकिन हर जगह एक बात कॉमन है। वह है कंपनियों की जवाबदेही तय करना।

भारत के लिए सीख

भारत को इन देशों से कई सबक सीखने चाहिए। सबसे बड़ी सीख ‘वेटिंग टाइम’ के भुगतान की है। ब्रिटेन में अगर आप ऐप लॉग इन करके बैठे हैं, तो आपको उसका पैसा मिलता है। भारत में आपको केवल राइड का पैसा मिलता है। इंतजार का समय बेकार जाता है। भारत को यह नियम अपनाना चाहिए।

दूसरी सीख पारदर्शिता की है। स्पेन की तरह भारत में भी एल्गोरिद्म पारदर्शी होना चाहिए। आपको पता होना चाहिए कि आपको कम ऑर्डर क्यों मिल रहे हैं। तीसरी सीख है सख्ती। कानून बनाना काफी नहीं है। चीन की तरह उसे लागू करना भी ज़रूरी है। भारत को सिंगापुर के पेंशन मॉडल पर भी गौर करना चाहिए। छोटी बचत ही बड़ा फंड बनाती है। हमें पश्चिमी देशों की गलतियों से भी बचना है। हमें लचीलापन खत्म नहीं करना है। हमें सुरक्षा और आज़ादी के बीच का रास्ता निकालना है। भारत को अपनी बड़ी आबादी के हिसाब से इन नियमों को ढालना होगा।

योजना को लेकर उठते सवाल और चिंताएँ

हर नई योजना अपने साथ कुछ सवाल लेकर आती है। गिग वर्कर्स योजना भी इससे अछूती नहीं है। सबसे बड़ा सवाल भरोसे का है। आप सोच रहे होंगे कि क्या सरकार सच में पैसा देगी या यह सिर्फ चुनावी जुमला है। अतीत में कई कल्याणकारी बोर्ड बने लेकिन उनका पैसा मजदूरों तक नहीं पहुँचा। लाल फीताशाही का डर हमेशा बना रहता है। क्या एक आम डिलीवरी बॉय सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट पाएगा।

चिंता इस बात की भी है कि कहीं यह योजना कंपनियों को काम देने से पीछे न हटा दे। अगर कंपनियों पर बोझ बढ़ेगा, तो वे भर्तियां कम कर सकती हैं। वे ऑटोमेशन की तरफ जा सकती हैं। इससे रोजगार कम हो सकता है। डेटा सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। सरकार कंपनियों से आपका पूरा डेटा मांग रही है। आपकी लोकेशन, कमाई और काम के घंटे सब कुछ ट्रैक होगा। निजता को लेकर यह एक बड़ी बहस है। क्या यह निगरानी सही है। आपको यह देखना होगा कि कार्यान्वयन कितना साफ-सुथरा होता है। अच्छी नियत काफी नहीं है। जमीन पर असर दिखना ज़रूरी है।

पात्रता की सख्त शर्तें

इस योजना का लाभ लेना सबके बस की बात नहीं होगी। शर्तें काफी सख्त रखी गई हैं। सबसे बड़ी बाधा ‘न्यूनतम कार्य दिवस’ की है। आपको साल में कम से कम 90 दिन काम करना होगा। यह उन छात्रों के लिए मुश्किल है जो सिर्फ परीक्षा के बाद काम करते हैं। या उन लोगों के लिए जो इसे सिर्फ पार्ट-टाइम शौक की तरह करते हैं। अगर आप 89 दिन काम करते हैं, तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। आपकी सारी मेहनत बेकार जा सकती है।

दस्तावेजों का पेंच भी फंसा सकता है। अगर आपके आधार और बैंक खाते के नाम में जरा सा भी अंतर हुआ, तो आपका क्लेम अटक जाएगा। भारत में डॉक्यूमेंट्स सही रखना एक बड़ी चुनौती है। प्रवासी मजदूरों के लिए पते का प्रमाण देना मुश्किल होता है। वे काम एक शहर में करते हैं और आधार गांव का होता है। यह बेमेल जानकारी आपको सिस्टम से बाहर कर सकती है। आपको अपनी पात्रता साबित करने के लिए हर कागज दुरुस्त रखना होगा। थोड़ी सी लापरवाही आपको सुरक्षा घेरे से बाहर कर देगी।

छोटे प्लेटफ़ॉर्म की मुश्किलें

यह कानून बड़ी कंपनियों जैसे उबर या स्विगी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। लेकिन इसका सबसे बुरा असर छोटे स्टार्टअप्स पर पड़ सकता है। आपके शहर में कोई लोकल डिलीवरी ऐप हो सकती है। उनके पास सीमित बजट होता है। वे एग्रीगेटर सेस देने की हालत में नहीं होते। उन पर अगर 2 प्रतिशत का भी भार पड़ा, तो वे बंद हो सकते हैं।

बड़ी कंपनियां यह खर्चा उठा सकती हैं। उनके पास गहरी जेबें हैं। लेकिन छोटी कंपनियां इस अनुपालन लागत के नीचे दब जाएंगी। उन्हें सॉफ्टवेयर अपडेट करने और कानूनी टीम रखने का खर्चा भारी पड़ेगा। इसका नुकसान अंत में आपको ही होगा। अगर छोटी कंपनियां बंद हो जाएंगी, तो बाजार में सिर्फ दो-तीन बड़ी कंपनियां बचेंगी। उनकी मोनोपोली हो जाएगी। फिर वे अपनी मनमानी करेंगी। वे आपको कम पैसे देंगी क्योंकि आपके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा। प्रतिस्पर्धा कम होना वर्कर्स के लिए कभी अच्छा नहीं होता। यह कानून अनजाने में बड़ी मछलियों को और ताकतवर बना सकता है।

आगे क्या सुधार किए जा सकते हैं

यह योजना एक अच्छी शुरुआत है लेकिन यह अंतिम पड़ाव नहीं है। इसमें अभी बहुत से छेद हैं जिन्हें भरना बाकी है। सबसे बड़ा सुधार ‘न्यूनतम आय’ की गारंटी का होना चाहिए। अभी आपकी कमाई पूरी तरह ऑर्डर पर निर्भर है। अगर आप चार घंटे लॉग इन रहते हैं और एक भी ऑर्डर नहीं आता, तो आपको कुछ नहीं मिलता। यह गलत है। सुधार यह होना चाहिए कि आपके ‘वेटिंग टाइम’ या इंतजार के समय का भी भुगतान हो।

पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती हैं लेकिन डिलीवरी का रेट वही रहता है। इसे महंगाई से जोड़ना होगा। जैसे सरकारी कर्मचारियों का भत्ता बढ़ता है, वैसे ही आपका बेस फेयर भी बढ़ना चाहिए। ईंधन की कीमतों के साथ आपकी कमाई अपने आप एडजस्ट होनी चाहिए। महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान जोड़ने की ज़रूरत है। महिला गिग वर्कर्स के लिए रात में सुरक्षा और शौचालय की सुविधा अनिवार्य होनी चाहिए। अभी योजना में इनका जिक्र बहुत कम है। सुधारों का केंद्र आपकी जेब और आपकी गरिमा दोनों होने चाहिए।

नियमों को और व्यावहारिक बनाना

नियमों को इतना सरल बनाना होगा कि एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी उसे समझ सके। अभी पंजीकरण की प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। इसे ‘वन-क्लिक’ सिस्टम बनाना चाहिए। जैसे ही आप ज़ोमैटो या उबर पर आईडी बनाते हैं, आपका सरकारी पंजीकरण अपने आप हो जाना चाहिए। आपको अलग से किसी पोर्टल पर जाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। टेक्नोलॉजी का काम जीवन आसान बनाना है, जटिल करना नहीं।

90 दिन की पात्रता शर्त को लचीला बनाना होगा। इसे दिनों के बजाय ‘घंटों’ में गिनना ज्यादा व्यावहारिक होगा। हो सकता है आप एक दिन में 12 घंटे काम करते हों। उसे केवल एक दिन गिनना आपकी मेहनत का अपमान है। अंतर-राज्यीय पोर्टेबिलिटी को निर्बाध बनाना होगा। ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ की तरह ‘वन नेशन, वन गिग वर्कर कार्ड’ होना चाहिए। आप दिल्ली में काम करें या चेन्नई में, सिस्टम को आपको एक ही मानना चाहिए। कागजी कार्रवाई को शून्य करना ही नियमों की असली सफलता होगी।

श्रमिक हितों को मज़बूत करना

आपकी असली ताकत आपकी एकजुटता में है। कानूनों में ‘डिजिटल यूनियन’ बनाने का अधिकार शामिल होना चाहिए। अभी आप बिखरे हुए हैं। ऐप के जरिए ही आपको वोटिंग और अपनी बात रखने का हक मिलना चाहिए। दूसरी सबसे बड़ी ज़रूरत ‘डेटा पोर्टेबिलिटी’ की है। आप सालों मेहनत करके एक ऐप पर 5-स्टार रेटिंग बनाते हैं। जब आप वह ऐप छोड़ते हैं, तो वह रेटिंग खत्म हो जाती है। आपको दूसरी जगह जीरो से शुरू करना पड़ता है।

यह रेटिंग आपकी संपत्ति है। कानून ऐसा होना चाहिए कि आप अपनी रेटिंग अपने साथ ले जा सकें। यह आपको कंपनियों के चंगुल से आज़ाद करेगा। एल्गोरिद्म की पारदर्शिता पर सख्त नियम चाहिए। आपको यह जानने का पूरा हक है कि आपको काम क्यों नहीं मिल रहा या आपकी आईडी क्यों ब्लॉक हुई। कंपनियों को कारण बताना अनिवार्य करना होगा। हितों की मजबूती का मतलब है शक्ति का संतुलन। अभी पलड़ा कंपनियों की तरफ झुका है। सुधारों को इसे आपके पक्ष में झुकाना होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. इस योजना का लाभ उठाने के लिए कौन पात्र है? 18 से 60 वर्ष का कोई भी भारतीय नागरिक जो ओला, उबर, स्विगी या ज़ोमैटो जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए काम करता है।

2. मुझे पंजीकरण कराने के लिए कहाँ जाना होगा? आप ई-श्रम पोर्टल या राज्य सरकार की निर्दिष्ट वेबसाइट पर जाकर अपने आधार कार्ड से घर बैठे ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते हैं।

3. क्या मुझे इस योजना के लिए अपनी जेब से पैसे देने होंगे? नहीं, यह फंड मुख्य रूप से एग्रीगेटर कंपनियों द्वारा दिए गए ‘कल्याण उपकर’ (Welfare Cess) से चलता है, आपको प्रीमियम नहीं भरना है।

4. अगर मैं एक साथ दो कंपनियों में काम करता हूँ तो क्या होगा? आपकी यूनिक आईडी के जरिए दोनों कंपनियों में किया गया काम जुड़ जाएगा और आपको कुल काम के आधार पर लाभ मिलेगा।

5. अगर कंपनी मेरी आईडी ब्लॉक कर दे तो मुझे मदद कहाँ मिलेगी? नए कानून के तहत आप कल्याण बोर्ड में शिकायत दर्ज करा सकते हैं जो आपकी समस्या सुनकर कंपनी से जवाब मांग सकता है।

निष्कर्ष : गिग वर्कर्स के लिए सुरक्षा की दिशा में एक कदम

यह योजना भारत के श्रम इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है। यह केवल एक सरकारी घोषणा नहीं है। यह लाखों कामगारों के लिए सम्मान की वापसी है। आपने अब तक बिना किसी सुरक्षा जाल के काम किया है। यह योजना उस जाल को बुनने की शुरुआत है। सरकार ने आखिरकार माना है कि डिजिटल काम भी ‘असली काम’ है। यह कदम आपको अनिश्चितता के अंधेरे से निकालकर सुरक्षा की रोशनी में लाता है।

यह पहल बताती है कि तकनीक और मानवीय संवेदनाएं साथ चल सकती हैं। अब मुनाफा कमाने के लिए किसी का शोषण करना ज़रूरी नहीं है। आप अब केवल एक एल्गोरिद्म के गुलाम नहीं हैं। आप कानून द्वारा संरक्षित एक नागरिक हैं। यह बदलाव रातों-रात नहीं आएगा। लेकिन दिशा सही है। यह योजना उस नींव का पत्थर है जिस पर भारत की आधुनिक श्रम व्यवस्था खड़ी होगी। यह आपको एक अदृश्य मशीन से एक दृश्यमान शक्ति में बदल रही है।

उपलब्धि और सीमाएँ

इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘पहचान’ है। आपको ‘गिग वर्कर’ के रूप में एक कानूनी नाम मिला है। कल्याण बोर्ड का गठन आपकी आवाज़ को एक मंच देता है। बीमा और सामाजिक सुरक्षा अब खैरात नहीं, बल्कि आपका अधिकार हैं। कंपनियों की जवाबदेही तय करना एक बड़ी जीत है। पहली बार किसी ने बड़ी टेक कंपनियों की आंखों में आंखें डालकर नियम बनाए हैं।

लेकिन सीमाएँ भी स्पष्ट हैं। 90 दिन की कार्य सीमा कई पात्र लोगों को बाहर कर देती है। न्यूनतम वेतन की गारंटी अभी भी गायब है। आप अभी भी बाज़ार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर हैं। राज्यों के बीच तालमेल की कमी इस रफ्तार को धीमा करती है। डेटा शेयरिंग को लेकर गोपनीयता की चिंताएं अभी भी सुलझी नहीं हैं। यह एक आधी जीती हुई लड़ाई है। ढांचा खड़ा हो गया है, लेकिन उसमें अभी रंग भरना बाकी है। आपको अभी भी अपने पूरे हक के लिए लंबा सफर तय करना है।

आने वाले समय की तस्वीर

भविष्य चुनौतियों से भरा है लेकिन उम्मीद भी जगाता है। गिग इकोनॉमी रुकेगी नहीं, यह और बड़ी होगी। आने वाले समय में प्लंबर से लेकर सॉफ्टवेयर कोडर तक सब गिग वर्कर होंगे। नौकरी की परिभाषा पूरी तरह बदल जाएगी। यह कानून समय के साथ और भी धारदार होगा। आप देखेंगे कि डिजिटल यूनियनें बनेंगी। आपकी ‘रेटिंग’ आपकी सबसे बड़ी डिजिटल संपत्ति बनेगी जिसे आप एक कंपनी से दूसरी कंपनी ले जा सकेंगे।

भारत दुनिया को दिखा सकता है कि एक विशाल आबादी को सामाजिक सुरक्षा कैसे दी जाती है। अनौपचारिक और औपचारिक काम के बीच की दीवार गिर जाएगी। कंपनियां समझ जाएंगी कि खुशहाल वर्कर ही अच्छा बिजनेस है। आपको सतर्क रहना होगा। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना होगा। यह शुरुआत है, अंत नहीं। बदलाव का पहिया घूम चुका है और अब यह वापस पीछे नहीं जाएगा। आप एक सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं।

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